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________________ पश्चात् मोह का त्याग करने वाली बहिन के साथ सुदन नामक महामुनिराज के पास आकर चञ्चलता छोड़ प्रशस्त वृद्धि के द्वारा मक्ति प्राप्त कराने वाली विद्या में निपुण आचार्यों से उसने शिक्षा प्राप्त की।।६।। इस प्रकार राजा यशोमति के जो पुत्र और पुत्री वन में गुरुचरणों की सेवा करते थे वही हम दोनों हैं। इनमें मुझे नाम से अमयरुचि और इसे अभयमती कहते हैं।।६१ ।। हे मारिदत्त! आज ये प्रहामुनि तुम्हारे नगर से बाहर वन में निवास का रहे हैं। उनकी आज्ञा से आहार के लिये हम दोनों यहा आये थे कि चण्डकर्मा के द्वारा पकड़ लिये गये ।।६२।। संकल्पी हिंसा से उत्पन्न जो भयंकर दुःख पूर्वमवों में उठाया है उसका स्मरण करते हुए दोनों बाल्य अवस्था में ही विशाल विभूति को छोड़कर सुदत्त मुनिराज के शिष्य हुए थे।।६३ ।। कहा हम दोनों का कृत्रिम पक्षी का वध करना और कहा वह दुःसह भवभ्रमण! इस प्रकार हम दोनों मन में सदा संताप करते रहते हैं। इस समय यहा जीवसमूह का घात करने के इच्छुक आपको देख कर हम दोनों आश्चर्य से बांकेत हैं, साथ ही हम लोगों को आप पर दवा भी उत्पन्न हो रही है।।६।। 7 ७५ -
SR No.090547
Book TitleYashodharcharitam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajsuri, Pannalal Jain
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages90
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size1 MB
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