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________________ इसलिये उसकी संगीत रूपी नाली के द्वारा जिसकी मनोवृत्ति हरी गयी है ऐसी मेरे प्रति वह कामदेव है। हे सखि! अधिक कहने से क्या लाभ हैं? उसके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती ।।४५ ।। इस प्रकार रागवृत्ति को दिखाने वाली उस सनी के द्वारा आग्रहपूर्वक कही गयी उस दूती ने शीघ्र ही उस अष्ट भङ्ग महावत के पास आकर उसे रानी का प्रेमी बना दिया ।।४६ ।। यथावसर रातदिन उसके साथ सुखोपभोग करती हुई रानी की सुगबुद्धि राजा यशोधर में क्रम-क्रम से क्षीणता को प्राप्त हो गयी।।४७ ।। आलोकन, आलिङ्गन तथा चायन आति में उसकी उम्स पुर्वानुभत स्थिति . ! . . को न देखता हुआ राजा यशोधर बुद्धि द्वारा परिशोध करने के लिये पहले से तैयार था ।।४८ || एक दिन वह सभा से राजसमूह को विदा कर सुसज्जित निवासगृह में प्रविष्ट हुआ और रात्रि में छलपूर्ण निद्रा लेकर उसी रानी के साथ सुन्दर शय्या पर सो गया ||४६ ।। जब रानी ने देखा कि राजा सो रहे हैं तब उनकी भुजाओं से आलिङ्गित अपनी शरीरयष्टि को खींच कर तथा पान, सुगन्धित पदार्थ और माला ले कर वह उस उपपति के समीप गयी।।५० ।। राजा उसकी दुष्टचेष्टा का पता लगाना चाहता था इसलिये वह म्यान से तलवार निकाल कर गुप्तरूप से उस के मार्ग में उस तरह पीछे-पीछे चला जिस तरह कि निकटकाल में मरनेवाला मनुष्य अपनीति के पीछे चलता है ।।१।। रानी समय का विलम्ब कर पहुंची थी इसलिये उस जार ने क्रुद्ध होकर उसके केश खींच उसे चमड़े की मुट्ठी से खूब पीटा ।।२।। उस मनिन शरीर जार में उसके दोनों पैर पकड़ कर जमीन पर घसीटा जिससे वह चीख उदी तथा उस प्रकार इधर-उधर हो गयी जिस प्रकार कि रात्रि के समय अन्धकार के द्वारा पीड़ित चन्द्रमा की कान्ति आकाश में इथरउथर होती रहती है।।५३ ।। > २७ 4
SR No.090547
Book TitleYashodharcharitam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajsuri, Pannalal Jain
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages90
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size1 MB
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