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* प्रथम सर्ग
मैं उन मुनिसुव्रतनाथ भगवान रूपी मेघ को नमस्कार करता हूं जिन्होंने अमन्त चतुष्टयरूपी लक्ष्मी के हर्ष से इन्द्ररूपी मयूरों के हर्षपूर्ण नृत्य को आरब्ध किया , तथा नियों के समर गा से स्तिये ।।१।।
अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये सर्व गुरु हमारी निर्वाण रूपी उत्कृष्ट लक्ष्मी को करें ।।२।। ____ जो काव्य रूपी मणियों के लिये रोहणगिरि के समान थे तथा सदा उत्कृष्ट रहते थे ऐसे श्रीमान् समन्तभद्रादि आचार्य हमारे लिए सुभाषित रूपी रत्नसमूह को देने वाले हों ।।३।।
यह संक्षिप्त इतिहास है, इसमें जो चित्त लगाते हैं उनके उत्कृष्ट शुभकमों का आस्रव होता है और अशुभ कर्मों की निर्जरा भी होती है ।।४।।
यह संक्षिप्त इतिहास संवेग को बढ़ाता है, शुद्ध सम्यग्दर्शन को करता है, व्याथियों को नष्ट करता है और मानसिक व्यथाओं को अच्छीतरह दूर करता है ||५||
जिसने श्री पार्श्वनाथचरित की कथा रची थी उन श्री वादिराज सूरि के द्वारा यशोधर महाराज की कथा रची गयी है।।६।।
इस भरतक्षेत्र के यौधेय नामक देश में अलकापुरी के समान राजपुर नामका नगर है ॥७॥
जिसका सुवर्णमय गगनचुम्बी कोट प्रतिदिन मध्याह्न के सूर्य के परियेष-मण्डल के समान सुशोभित होता है ।।८।।
महलों के शिखरों पर संलग्न पद्मराग मणियों की किरणों से मिश्रित पध्याह के सूर्य का आताप जहाँ प्रातःकाल के स्वर्णिम आताप के समान आचरण करता है ।।।।