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________________ ७० ] ब्रत कथा कोष के व्रतों को कितने दिन तक करना चाहिए, इसका विस्तार सहित विचार किया है। श्री गौतमगणधर तथा श्र तज्ञान के पारगामी अन्य आचार्यों ने अपनी व्यवस्था देते हुए कहा है कि तिथिह्रास होने पर भी व्रत को अपनी निश्चित दिनसंख्या तक करना चाहिए । मध्य में प्रथवा आदि, अन्त में तिथिक्षय हो तो एक दिन आगे से व्रत का निश्चित दिनों तक पालन करना चाहिए। दशलक्षण, रत्नत्रय और अष्टान्हिका ये तीनों व्रत अपनी निश्चित दिनसंख्या तक किये जाते हैं । दश लक्षण व्रत के दस दिनों में से प्रत्येक दिन एक-एक धर्म के स्वरूप का मनन किया जाता है । तिथि-ह्रास के कारण यदि एक दिन कम व्रत किया जाय तो एक धर्म के स्वरुप के मनन का अभाव हो जायगा; जिससे समग्र व्रत का फल नहीं मिल सकेगा । जैनाचार्यों ने तिथि-ह्रास होने पर विभिन्न व्रतों के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं बतलाई हैं। कुन्दकुन्द, पूज्यपाद, जिनसेन, अभ्रदेव, सिंहनन्दी, दामोदर आदि आचार्यों ने दशलक्षण और अष्टान्हिका व्रत के लिए मध्य, अन्त या आदि में तिथिक्षय होने पर एक मत से स्वीकार किया है कि एक दिन पहले से व्रत करना चाहिए । गौतमगणधर आदि प्राचीन आचार्यों से भी उक्त मत ही समर्थित है । सिंहनन्दी आचार्य ने तिथिक्षय की व्यवस्था करते हुए कहा है कि प्रत्येक तिथि में पांच मुहूर्त पाये जाते हैं-आनन्द, सिद्ध, काल, क्षय और ममृत । इन पांच मुहूर्तों में तिथिक्षय की अवस्था में अर्थात् उदयकाल में तिथि के न मिलने पर तिथि में तीन मुहूर्त रहते हैं-काल, आनन्द और अमृत । तिथि-क्षयवाला दिन अशुभ इसीलिए माना गया है क्योंकि इसमें प्रातःकाल छः घटी तक काल मुहूर्त रहता है, जो समस्त कार्यों को बिगाड़ने वाला होता है । उदयकाल में छः घटी प्रमाण तिथि के होने पर प्रथम आनन्द मुहूर्त आता है, तथा छः घटी के उपरान्त बारह घटी तक सिद्ध मुहूर्त रहता हैं जिससे इसमें किये गये सभी कार्य सफल होते हैं । व्रतोपवास और धर्मध्यान की क्रियाएं भी सफल होती हैं, क्योंकि आनन्द और सिद्ध मुहूर्त अपने नाम के अनुसार ही फल देते हैं। मूलसंघ के प्राचार्यों ने इसी कारण व्रततिथि का प्रमाण छः घटी माना है। काष्ठासंघ में व्रततिथि का प्रमाण समस्त तिथि का षष्ठाँश माना गया है, वह भी इसी कारण युक्तिसंगत है कि सिद्ध मुहूर्त तक काष्ठासंघ के प्राचार्यों ने तिथि को ग्रहण किया है । जो बीस घटो प्रमाण व्रततिथि का मान मानते हैं, उनका मत सदोष प्रतीत होता है, क्योंकि काल और क्षयमुहूर्त, जो कि अपने नाम के
SR No.090544
Book TitleVrat Katha kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages808
LanguageHindi
ClassificationDictionary, Ritual_text, Ritual, & Story
File Size21 MB
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