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________________ - २.३.४ ] हिन्दी अनुवाद उनी में भयानको नहारा परीक्षा भगवान अपने शरीरके संस्कारको कोई क्रिया नहीं करते थे। वे बड़े-बड़े परिषहोंको भो सहन करते थे और धैर्य नहीं छोड़ते थे। अपने बढ़ते हुए केशोंकी जटाओंसे लिपटे हुए वे ऐसे दिखाई देते थे मानो अनेक सपंरूपी मालाओंसे वेष्टित चन्दनका वृक्ष हो । एक दिन उज्जैनीके भयंकर श्मशान में अन्धकारसे कालो भोषण रात्रिके समय वे सिद्धि रूपी महिलाके प्रियपति प्रतिमा योगसे स्थित थे, तभी उस अवस्थामें लोगों के जन्म-मरण रूपी व्याधिका हरण करनेवाले परमश्रे योगीश्वरको रुद्रने देखा। रुद्रने विचारा-देखू, क्या यह उपसर्ग करनेपर अस्त होता है और क्या अपने चारित्ररूपी गिरीन्द्रसे नीचे गिरता है ? देखू कि यह सम्यकदर्शन धारण करनेवाली प्रियकारिणी देवोका ही पुत्र जिनेन्द्र है, या नहीं। ऐसा विचार करके उस ज्येष्ठाके पुत्र रुद्रने लाल आँखें, टेढी भौहें और भीषण मुख बनाकर काल-कंकालधारी बैताल बनाये जो अपने हाथों में तलवार, शूल, झष और फरसे लिये थे। उनके केश पिंगल वर्ण और खड़े हुए थे, नख बड़े लम्बे थे तथा वे अपनी किलकिलाहटको ध्वनिसे भुवनरूपी गृहको बहिरा कर रहे थे। रुद्रकी प्रेरणासे वे सब भगवानको ओर दौड़े। सिंह भी उनपर झपट पड़े और भीषण विषधारी सर्प भी उनकी ओर फुफकार करते हुए दौड़ पड़े। इसके अतिरिक्त भी उन रुद्र हरने जो भुत्रनमात्रका संहार करने में समर्थ थे, अपनी विद्याओं द्वारा भीषण मेघोंको दर्शाया और घोर जल वृष्टि की ॥२॥ रुद्रका उपसर्ग विफल हुमा रुद्रने समस्त वनचरों द्वारा क्षोभ उत्पन्न कराया। धगधकाती हुई अग्नि भी जलायो और नाना प्रकारके ऐसे अस्त्र-शस्त्र भी छोड़े जिनसे देव, इन्द्र और चन्द्रका भी दपं चूर-चूर हो जाय । किन्तु रुद्रके समस्त
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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