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________________ ܕ १० १५ २० २५ २६ बीरजिविचरिउ ण करइ सरीर-संठप्प - चिह्नि । सुपरीसह सहइ ण मुयह दिहि || वडत केस जड-मालियर । चंद फणिउल-माणियउ || उज्जेहि पिवणि भययरिहि । तम- कसणहि भीम-विहावरिहि ।। अण्णहि विणि सिद्धि-पुरंधि-पिउ पिवणि पडिमा जोएण थिल ॥ जोईसर जण-जणणत्तिहरु | अत्रलोइ रुहे परमपरु ॥ मई कय उवसग्गहु किं तसइ । पिय चरिय गिरिं किं ल्हसइ । किं ण णंदणु पियकारिणिहि । जोयउँ जिणु सम्म धारिणिहि ॥ इस चितिथि जेहा-तणुरुहिण | पिंगच्छि- भिउडि-भीसण- मुहिण || बेयाल का कंकाल -घर । करवाल-सूल-क्षस पर सुंकर ॥ पिंगुद्ध केस दीहर-हर | फिलिकिलि-रव-बहिरिय-भुवणहर ।। चोइय धाइय हरिदिष्ण-कम | फुफुप्फुयंत विसि विसविसम || पत्ता- कय- भुषणय ल-विम [ २.२.१ पुणु त्रि हरेण रहें || णिय-विज्जहिं दरिसाविड गुरु पाउसु वरिसाविङ ॥२॥ ३ पुणु वणयर-गणु कय-पंडिखलणु । पुणु धगधगंतु जालिउ जणु ॥ देविंद चंद दप्प-हरण हैं । पुणु मुक्त गाणा-पहरण हूँ ||
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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