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________________ [ १. ५. ११ योरजिणिवचरिउ चरण-कमल-जुय-णमियाहंडलु । दिक्खंकिउ मेल्लिवि महिमंडलु ।। हरि-कुरु-कुल-कच्छाइणरिंदहि । समउ णमंसिउ इंद-पडिदहि ।। झाणालीगु पियामा जइयहुँ। णत्तउ जह पावइयउ तझ्यहुँ । दुच्चर-रिसइ-महा-तय-लग्गउ । भग णराहिव एह वि भगाउ ।। सरवरसालेगु पि६इ गाउ भुक्खई भज्जइ लज्जइ णग्गउ ।। वकलु परिहाइ तरु-हल भक्खइ। मिच्छाइहि असच्चु णिरिक्खइ ।। पत्ता-बहु-दुरिय-महल्ले मिच्छा-सल्लें विविह-देह-संघार। मरहेसर-गंदणु संसय-हय-मणु चिर हिंडिवि संसारइ ।।५।। दुवई--धुव-णीसासु मुयइ सो तेत्तिय पक्खहिँ दुह-विहंजणो। जाणइ ताम जाम छट्ठावणि वडिय-ओहि-दसणो ॥ परमागम-साहिय-दिव-माणि । णिवसंतहु पुप्फुत्तर-विमाणि || जश्यह बट्टाइ छम्मासु ताम् । परमाउ-माउ परमेसरासु ॥ तझ्यहुँ सोहम्म-सुराहिवेण । पणि कुबेरु इच्छिय-सिवेण || यह जंबुदीवि भरतरालि । नमणीय-विसइ सोहा-विसालि ।। कुंडरि राउ सिद्धत्थु सहित । जो सिरिहरु मग्गण-वेस रहिउ ।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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