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________________ १. ५. १०] हिन्दी अनुवाद नहीं। वहाँके तोरण-द्वार कल्पवृक्षोंके पल्लवोंसे सुशोभित थे। वह विचित्र वर्णके सात प्राकारोंसे सुरक्षित था। वहाँके गवाक्ष धूपके घूएंसे काले हो रहे थे। बहाके भूमिभाग इतने सुन्दर थे कि वे इन्द्रका भी मनोरंजन करते थे। ऐसी उस अयोध्या नगरीके राजा ऋषभनाथ थे, जिनके चरणों में देवेन्द्र भो नमस्कार करते थे। उन्होंने दीर्घकाल तक राज्य किया। वे विशुद्ध ज्ञानके धारक शुभशंकर ( पुण्य और सुखकर्ता ) प्रथम नरेन्द्र और प्रथम तीर्थकर हुए। वे ही आदिब्रह्म, महादेव और महाविष्णु कहलाये। वे तीनों लोकोंके गुरु तथा मनोरथोंके पूरक हुए। उनके प्रथम पुत्र भरतेश्वर थे, जो षट्खण्ड पृथ्वोके सम्राट् हुए। उन्होंने घेताढ्य गिरिपर निवास करनेवाले सुन्दर देहधारो मागधप्रभास नामक देवको भी जीत लिया। उन्होंने विद्याधरीक स्वामी नाम जोर किमि नामक राजाओंको भयसे कम्पायमान कराकर उनसे अपनी सेवा करायी। बाळमगनयनी लक्ष्मी भी उनकी सेवा करती थी। गंगा और सिन्धु नदी-देवियां उनका अभिषेक करती थों तथा नये कमलदलोंके सदृश नेत्रोंवाले उपवन-निवासो यक्ष भी नाना प्रकारके पुष्पोंसे उनको पूजा करते थे ॥४॥ भरत चक्रवर्तीकी रानी अनम्तमतीने उस शबरके जीवको मरीचि नामक पुत्र के रूपमें जन्म दिया भरतकी रानी अनन्तमती अत्यन्त सुन्दर थी। उसके हाथ कंकेली पुष्पोंके दलोंके समान कोमल तथा उसका स्वर वीणा, हंस, बांसुरी व कोकिलके समान मधुर था। उसी तुग-पयोघरी देवोके गर्भ में वह शबरका जीय आकर उत्पन्न हुआ, जिसके ऊपर देवलोकको सुन्दरियां चमर ढोरती थीं। उनका वह पुत्र मरीचि नामसे विख्यात हुआ। उसका शरीर अनेक शुभ लक्षणोंसे अलंकृत था। जब उसके पितामह देवों के देव व अत्यन्त ज्ञानवान् नीलांजसा नर्तकोके मरणसे विरक्त होकर पृथ्वी
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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