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________________ वीरजिणिवचरिउ कड़वक श्रेणिक धर्मलाभ व तीर्थंकर गोत्र-बन्ध [९२-९९] १ राजा श्रेणिककी आखेट-यात्रा, मुनि-दर्शन व भाव परिवर्तन । २ श्रेणिकराजा जन-शासनके भक्त बनकर राजधानी में लौटे। ३ महावीरने विपुलाचल पर मानेकी सूचना और श्रेणिकका उनकी बन्दना हेतु गमन । ४ महावीरका उपदेश सुनकर राजा श्रेणिकको क्षायिक-सम्यक्त्वकी उत्पत्ति । सन्धि -२ श्रेणिक-धर्म-परीक्षा [१००-१०५] १ श्रेणिकके सम्यक्त्वकी परीक्षा हेतु देवका धीवर-रूप-धारण । २ देवमुनिके धीवर-कर्मसे लोगोंमें दिगम्बर धर्मके प्रति धुणा तथा श्रेणिक द्वारा उसका निवारण । ३ मलिन मुद्राओं के उदाहरणसे सामन्तों की शंका-निवारण य देव द्वारा राजाको वरदान । सन्धि-१० श्रेणिक-पुत्र वारिषेणकी योग-साधना [१०६-११३] .१ वारिषेणकी धार्मिक-वृत्ति । विद्युच्चर चौरकी प्रयसी गणिकासुन्दरीको चेलना रानीका हार पानेका उन्माद । २ विद्युच्चर घोर द्वारा रानीके हारका अपहरण तथा राजपुरुषों द्वारा पीछा किये जानेपर ध्यानस्थ वारिपेणके पास हार फेंककर पलायन | राजा द्वारा वारिषेणको मार डालनेका आदेश । ३ देवों द्वारा वारिषेणकी रक्षा । राजाके मनानेपर भी मुनि-दीक्षा एवं पलासखेड ग्राममें आहार ग्रहण । ४ पुष्पडाल साह्मणकी दीक्षा, मोहोत्ति और उसका निवारण ।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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