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________________ वीरजिणिचारिज [१२. ७. ११पयडिहि माणवंगु मेल्लेप्पिणु । सुद्धसहाज सुइंमु लहेप्पिणु ।। जे गय जीव परम-णिबाणहु । दुक्ख-विमुबहु सासय-ठाणहु ।। चरम सरीर-मामिणा। वधगय-रोय-सोय अविलीणा ।। णिम्मल णिरुबम गिरहंकारा। जीव-दव-घण णाण-सरीरा॥ उडू-गमण-सहाव गंपिण ।। उल-लोउ सयलु वि लंघेप्पिणु ।। अहम पुहई-ट्टि णिविट्ठा । अभव जीव जिणदेवें दिट्ठा ।। घत्ता-ते साइ अणाइ दुविह अणंत जि बिबिह-दुहे। ते पुणु ण मरंति गट पडति संसारमुह ॥७॥ ण बाल उ चुद्ध णीसाव णित्ताथ णाणंग णिम्मेह शिकोह णिल्लोह णिवेन गिजोय गिद्धम्म णिक्कम्म णीराम णिकाम णिश्वेस णिल्लेस । णीरस महाभाष अञ्चत्त चिम्मत ण छुहाइ घेप्पति ण रुयाइ झिज्जंति जाहारु मुंजेति जमलेण लिप्पति ण मुक्ख सुवियट । पिरगाव णिप्पाव। णिपणेह णिहह । णिम्माण णिम्मोह। णीराय णिब्भोय। णिच्छम्म णिजम्म। णिबाह णिद्धाम । णिगंध णिप्फास । णीसह णीरूप । णिञ्चित णिश्चित्त । ण तिसाइ छिप्पंति । ण रईह सिजति । ओसहु ण जुज्जति । ण जलेण धुप्पंति। १०
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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