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________________ १० ५ १५ २० २५ संधि ६ परसेणिय- सुप - चिलाय पुत्त - परोसह १ सच्वंगु वि मिलियहिं उजंगुलियहिं चालणि व्य किउ धीर-मणु । सहवि निरवो न वि निय-कजहो चलिउ चिलायपुत्तु समगु ॥ महा-विस असि गुणवंतड । गुहिल सत्यवाहि वणि होत ॥ तेण सियाल पंथ समलें । गच्छते समे स- सत्यं ॥ सुणि गामंतर तर नामच । भिक्खागड निवि जिय-काम || सिद्धउ अन्नु नत्थि समभाविउ | गुलु तिल-बट्टि देवि भुंजावि ॥ तेण फलेण दीव पद मिल्ला । हमवयम्मि खेत्ते सोहिल्ला || कालु करेणु को माग । हुन पलिओम जीवित माणन || पुणे नंदणवर्ण सुरु तत्तो चुउ । मगहा- मंडले रायगिहे हुउ ।। परसेणियो नरिंदो नंद | रूवं जण-मध्य-णयणाणं ॥ जणिउ चिलाय देवि जेण जं । नाम चिलायपुत्तु किड तेण जे 1 श्रचा एकहिंदि रामँ बद्ध-कसाएँ अदाय उज्जेणि पुरि । संगरि संदाणहि बंधेवि आणहि पेस पज्जोहो उवरि ॥१॥
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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