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________________ ६७ ५.४.२] हिन्दी अनुवाद लेकर इन्द्रियोंको जीतते हुए उन्हींके चरणोंमें रहने लगी। उधर चेलिनीको तुम्हारा पुत्र राजगृह ले आया और उसका तुमने अत्यन्त स्नेहभावसे अवलोकन किया। तुमने जय-जय घोषके साथ उस सून्दरीका परिणयन कर लिया और सौहार्दपूर्ण भाग्यसे उसे अपने घर ले आये। तुमने चेलनाको महादेवी पदपर प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार वह रति और तुम कामदेवके समान सुखसे रहने लगे। उधर चेटककी सबसे लहुरी पुत्री चन्दनाने धर्मभावसे प्रेरित होकर सुक्षान्ति नामक आर्यिकाके.समीप थावक व्रत ग्रहण कर लिया। सम्यक्त्व भावसे सुन्दर गुण-प्रचुर वेताढ्यगिरिकी दक्षिण श्रेणीमें स्थित सुवर्णनाभ नामक पुरीमें मनोवेग नामक विद्याधर रहता था। एक दिन वह अपनी गृहिणीके साथ आकाशमें विहार करता हुआ उस उपवनमें आया जहाँ नित्य ही वसन्त ऋतु रहा करती थी और जहाँ चन्दनके वृक्षोंकी सुगन्ध रहती थी। वहां उसने चन्दना कुमारीको देखा। देखने ही उसने वापिस जाकर अपनी गृहिणीको तो अपने घरमें जा छोड़ा और पुनः उसी उपवनमें आकर कन्याका अपहरण कर लिया। उसे लेकर जब वह अपने घरको पुनः जाने लगा तब उसने आकाशसे उतरती हुई आलोकिती विद्यादेवीको देखा। देवीने उससे बात कही कि देवी ( तेरी पत्नी मनोवेगा ) ने तुम्हें मायाचारी जान लिया है, और रोषपूर्ण होकर तरी विद्याको अपने बायें परसे ठुकरा दिया है 1 तुमने इस प्रकार इस कुमारीको क्यों अपहृत किया ? इसीलिए तेरी गृहिणी कोपाग्निसे प्रज्वलित हो रही है । यह सुनकर मनोवेग नित्य अपने हृदयमें विराजमान रहनेवाली अपनी कान्तासे भयभीत हो उठा। उस विद्याधरने विशाल इरावतीके तीर पर स्थित भूतरमण नामक वनके बीच फणीश्वर (नागेश्वर या गरुड) की विद्याको सिद्ध किया ॥३॥ चन्दनाका वन त्याग, भिल्लों द्वारा रक्षण तथा कौशाम्बीके सेठ धनदत्तके घर आगमन ! मनोवेगने पत्रलघु नामकी अपनी उसी विद्याके बलसे चन्दनाको उक्त वनमें फेंक दिया और वह उसीके प्रभावसे भूमितलपर उतर गयी।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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