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________________ घोरजिणिवचरित [ ५. ३. ५चेलिणि पुणु तुह पुत्तें ढोइय । पर स-सणेहें णिरु अवलोइय ॥ परिणिय सुंदरि जय-जय-सहें। घर आणिय दइयेण सहहें। तहि महएवी-पट्ट णिबद्ध । सा रइ तुहुँ णावइ मयरद्धउ ॥ ताहि सुखंतिहि पासि णिहालिउ । चंदणाइ सावय-वज पालिउ ॥ सहुँ सम्मत्त चार गुणड्डय। दाहिण-सेडिइ गिरि वेयड्ड । सोवण्णाहर पुरि मणवेयउ। विहरमाणु णहि परिणि-समेयर ।। आयउ उववणि णिच्च-वसंतई । दिट्ठी चंदण चंदणचंतई ।। णियय-धरिणि णिय गेहे थचेपिणु । पडिआवेप्पिणु कण लएप्पिणु ।। सो जा गच्छद पुणु णिय-भवणष्ठ । आलोयणिय दिट्ट ता गयणहु ।। अवयरंति आहास वइयरु । देबिई तुहँ जाणिउ मायायर ॥ तुज्झु विज्ज कय-रोस-णिहाएं। ताडिय देवय वाम पाएं। एवहिं किं कुमारि पई चालिय । अच्छा कोव-जलण-पजालिय ।। णिच्चमेय हियवद संकंतहि । तं णिसुणिवि सो भीयउ कंतहि ।। घत्ता-भूय रमण-वण-मज्झि पवर-इरावइ-तीरइ ।। साहिय तेण खगेण विज्ज फीसर केरह ।।३।। पत्तलय णामेण णिहिती। ताह पुत्ति संपत्त धरिती ॥
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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