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________________ ५. ३. ४ ] हिन्दी अनुवाद उनका किसी के साथ विवाह सम्बन्ध नहीं हुआ। हे खलरूपी अन्धकारके सूर्य, सबसे छोटी कन्या ( चन्दना) अभी भी अबोध है। अपने किंकरोंके इन वचनोंसे तुम मदनके बाणसे आहत हो गये । तब तुम्हारे मन्त्रियोंने तुम्हारे पुत्रसे कहा-हाय, हाय, हे कुमार, तुम्हारे पिता कामासक्त होकर इस अवस्थाको प्राप्त हुए हैं। वे राजा चेटककी पूर्वीपर अत्यन्त आसक्त होकर ऐसे अनुरक्त दिखाई देते हैं जैसे सूर्य अत्यन्त रक्तवर्ण होकर सबके दृष्टिगोचर हो जाता है । किन्तु उनके प्रस्तावित श्वसुर अर्थात् राजा चेटक उन्हें इस कारण अपनी कन्या नहीं देना चाहते, क्योंकि वे आयुमें बृद्ध हो चुके हैं। यह अवसर हैं जब तुम अपनी बुद्धि और धैर्यका अच्छा परिचय दे सकते हो । गौतम मुनि राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन, मन्त्रियोंकी उक्त बातको सुनकर राजकुमारने तुम्हारा चित्रपट बनवाया। चित्रपट बन जानेपर एक भट उसे कुमारके निवासस्थानपर ले गया। फिर वह राजकुमार पण्डित वोद्र ( बैल लादने वाले ? ) वणिक्का वेश बना कर वैशाली नगरमें पहुँचा। राजकन्याओंने चित्रपटमें लिखित नवबयस्क तथा सुन्दर वेषयुक्त पुरुषको देखकर उसके सम्बन्धमें पूछताछ की। तब वणिक-वेषधारी राजकूमारने कहा-क्या आप नहीं जानती कि ये मगधके नरेन्द्र श्रेणिक हैं। यह सुनकर उन दोनों कन्याओंके नेत्र मदोन्मत्त हो उठे और प्रेमरूपी केगरसे रंजित हो गये । दोनों बहिनोंमें चेलिनी अधिक चतुर थी। उसने कामसे पीड़ित तथा रति से लुब्ध होकर बहिन ज्येष्ठासे छलपूर्वक कहा-आप अपने निवासपर जाकर आभूषणोंको ले आइए, तब हम दोनों यहाँसे चपचाप छिपकर निकल चलेंगे, तथा भ्रमर समूहके समान नील और स्निग्ध तथा मृदु केशोंसे युक्त मगधेशके गलेमें लगकर उनका आलिंगन करेंगे। किन्तु जन ज्येष्ठा आभूषण लेकर लौटी तब उसने वहाँ मदनोत्सुक चेलिनोको नहीं देखा ॥२॥ ज्येष्ठाका वैराग्य, चेलिनी-श्रेणिक विवाह तथा चन्वनाका मनोवेग विद्याधर द्वारा अपहरण व इरावती के तोरपर उसका त्याग अपनी बहिनके वियोगके शोकसे संतप्त होकर ज्येष्ठा यशोमति नामक आर्यिकाके समीप जाकर उपशान्त हुई और उन्हीसे तपश्चरणकी दीक्षा
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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