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योर जिfवचरिज
वणि तुम्हारिसेहिं अण्णामहिं । सो कुसी कहिंसिय पाहिं ॥
[ ४.४.२९
घत्ता - दुःपेक्खें दुक्खें पीडियउ वणिवइ आवइ पत्तउ | जिण-वय रयणें वज्जियउ जीउ वि परह गित ||४||
गड पाविदु उम्मग्गे । त्रिसय कसाय- बोर-संसर्गे ॥ तं आणिवि-पर-वण-हारें । उत्तर विष्णु बुद्धि-वित्थारे !! सासुय कुद्ध सुग्रह् हणालइ | मरण - काम डिट्ठी तर मूलइ ॥ णिसुणि सुवण्णदारु पाउहिए । आहरणहु लोहे मह-रहिएं ॥ मरणोवाउ सिद् धवलच्छिहि । गय-मयणहि घर-पंकय लिहि ॥ महल पाय दिष्णु गल्लि पासव | तग्णिबाइ सुख दुर दुरासउ ॥ सो मुख जोइवि णीसासुहइ ।
-गमगु पडिवण्णव सुहइ || जिह सो मुड - कंकण-मोहें । तिह तुहुँ म मरु मोक्ख -सुह-लोहें ।। भइ कुमार धुत्त ललिश्रंगल । एक्कहिं यरि अस्थि रह-रंग ॥ तं जयंति का वि मणि- मेहल | कय मय महवि विसंठुल ॥ आणि धाइ पच्छिमदारें । tas रमित्र सुणिउ परिवारें ॥ राएं जाउ सो हिक्काविउ | असुर-पवणि विवरि घल्लाविव ।। किमि खजंतु दुक्खु पावेष्पिणु । उसी रयहु पाणमुपप्पिणु ।।