SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 123
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३० १० १५ २० २५ ५४ योर जिfवचरिज वणि तुम्हारिसेहिं अण्णामहिं । सो कुसी कहिंसिय पाहिं ॥ [ ४.४.२९ घत्ता - दुःपेक्खें दुक्खें पीडियउ वणिवइ आवइ पत्तउ | जिण-वय रयणें वज्जियउ जीउ वि परह गित ||४|| गड पाविदु उम्मग्गे । त्रिसय कसाय- बोर-संसर्गे ॥ तं आणिवि-पर-वण-हारें । उत्तर विष्णु बुद्धि-वित्थारे !! सासुय कुद्ध सुग्रह् हणालइ | मरण - काम डिट्ठी तर मूलइ ॥ णिसुणि सुवण्णदारु पाउहिए । आहरणहु लोहे मह-रहिएं ॥ मरणोवाउ सिद् धवलच्छिहि । गय-मयणहि घर-पंकय लिहि ॥ महल पाय दिष्णु गल्लि पासव | तग्णिबाइ सुख दुर दुरासउ ॥ सो मुख जोइवि णीसासुहइ । -गमगु पडिवण्णव सुहइ || जिह सो मुड - कंकण-मोहें । तिह तुहुँ म मरु मोक्ख -सुह-लोहें ।। भइ कुमार धुत्त ललिश्रंगल । एक्कहिं यरि अस्थि रह-रंग ॥ तं जयंति का वि मणि- मेहल | कय मय महवि विसंठुल ॥ आणि धाइ पच्छिमदारें । tas रमित्र सुणिउ परिवारें ॥ राएं जाउ सो हिक्काविउ | असुर-पवणि विवरि घल्लाविव ।। किमि खजंतु दुक्खु पावेष्पिणु । उसी रयहु पाणमुपप्पिणु ।।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy