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________________ १५ २० २५ ૪૦ १० वीरजिणि वरि तहिं वासरि उत्पाद केवलु | सुणिहि सुषम्म पक्खालिय-मलु ॥ तण्णव्वाणइ जंबूदारु । पंच दिव्व णाणु हय-कामहु ॥ मंदि सु-दिमित्त अवरु वि मुणि। गोवद्भणु चत्धु जलहर-झुणि ॥ ए पच्छइ समत्थ सुय-पास्य । गिरसिया - मिच्छायम रुि णीरय ॥ पुणु वि विसहज पोहिल खत्तिव । जउ गाउ वि सिद्धत्थु इयति ॥ दिसे विजय बुद्धिल्लउ । गंगु धम्मसे विणीसल्लड || पुणु वाक्खत्त पुणु जसवाल 1 पंड णाम घुसेगु गुणालच ॥ [ ३.२.१३ घत्ता -- अणुकंसउ अप्पन जिणिचि थिउ पुणु सुहद्दु जग-सुहरु 11 जसभदु अखुदु अमंद-मंद णार्णे णावर गणहरु ||२|| ३ मद्दवाहु लोकु भडारउ | आयारंग धारि जग-सारउ ॥ यहि सव्यु सत्धुमणि माणिउ । सेस एक्कु देसु परियाणि ॥ पुव्वयालि सुइ णिसुणिय भरहें । राएं रिङ बहु-दाघिय विरहें || एव राय-परिवाडि णिसुणिउ । धम्मु महामुनि जाहहिं पिसुणिउ ॥ सेणिय-राउ धम्म-सोयार हूँ । पछिल्लउ वज्जिय-भय-भारहूँ || जिणसेणेण वीरसेणेण वि ॥ जिण सासणु सेवित्र मय-गिरि-पवि || ता विपच्छ बहु-रस-गडियइ । भर कारात्रि पद्धडिय || 1
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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