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________________ ६. वाग्भटालारः। मणिमाला से मण्डित, उसलुओं की ध्वनिरूप फूत्कार करती हुई मह निशापिशाचिनी कहाँ से आ गयी। टिप्पणी-यहाँ पर उपमेयभूत रात्रि का उपमामभूत पिशाची से साधर्थ है, जिसका सम्यकप से वर्णन किया गया है। साथ ही निशापिशाची एक समस्त पद भी है । अतः यह समस्त पूर्णरूपक का उदाहरण हथा ॥ ५५ ॥ असा पग्विभक्त्या यम । यथा -- संसार एष कूपः सलिलानि विपत्तिजन्मदुःखानि | इह धर्म एवं रज्जुस्तस्मादुद्धरनि निर्ममान् ।। ६६ ।। एष संसार- कृपः । विपतिजन्मदुःस्वानि सलिलानि । धर्म एन रज्जुस्तस्मात्संसारक्षानिर्ममाप्राणिन उद्धरति । अत्र पृथक पृथक विमक्तिमायादसमस्तो रूपकालकारः ॥ ६ ॥ इस संसारकूप में विपत्ति, जन्म और दुःख ही जल है। धर्मरूप रस्सी इन विपत्ति, जन्म और पुःखरूप अल में दूबे हुए लोगों को निकालने वाली है। हिप्पणी--यहाँ संसार, विपत्ति, जन्म, दुःस्व और धर्म-ये उपमेय हैं और कूप, जल तथा रस्सी उपमान। इनमें कोई भी पद समस्त न होने के कारण असमस्त पूर्णरूपक अलकार है ॥१९॥ प्रतत्समस्तासमस्समुमयमपि द्विधा खण्डमखण्डं च । तदेवाह-- अधरं मुखेन नयनेन रुचिं सुरभित्वमाब्जमिय नासिकया । नववर्णिनीवदनचन्द्रमसस्वरुणा रसेन युगपनिपपुः ।। ६७ ॥ तरुण। नवगिनीबदनचन्द्रमसो नचरमणीमुखचन्द्रस्य रसेन युगपन्मुखेनाधरं निपपुः । नयनेन रुनि निपपुः। नासिकया सरभित्वे निपपुः । उत्प्रेक्षते-अमिव । यथा नासिकया भाजं सुरमित्वं निपीयत इत्यर्थः 1 अत्र वदनचन्द्रमसौ मुखेनाधर्ष नयनेन चिमित्यादिखण्डकरणारखण्डरूपकमिदम् । आमिनेति। पचिनो सी कमळगया भवत्यैव ॥ ७॥ युवक जन एक साथ ही प्रेम से नवोढा कामिनियों के प्रमुख का अधरपाम मुख से करते है, कान्ति का मास्वाद नेत्रों से लेते हैं और कमल के समान उन कामिनियों की जो सुगन्धि है-उसका रस ये नासिका द्वारा प्रहण किया करते हैं। ___ टिप्पणी-यहाँ पर उपमेयरूप नयोहा के मुख और उपमानरूप पन्द्रमा के सभी धर्मों में साम्य म होने से निरारूपक है और 'नयकामिनीववनचन्द्रमसः' एक समस्त पद है। मतएव यह समस्तखण्डरूपक मलकार का उदाहरण है ॥१७॥
SR No.090529
Book TitleVagbhattalankar
Original Sutra AuthorVagbhatt Mahakavi
AuthorSatyavratsinh
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages123
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
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