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________________ [१९ यह सुनते ही अमिततेज के भ्र कुचित हो गए। क्रोध से कपोल आरक्त हो उठे। उन्होंने श्री विजय से कहा- 'वह दुष्ट अशनिघोष मेरी बहिन और आपकी पत्नी सुतारा का हरण कर कितने दिन बचेगा? कारण उसने तत्काल सर्प के मुह में हाथ दिया है, सोते हुए सिंह के केश पकड़ कर उसे जगाया है।' ऐसा कहकर अमिततेज ने श्री विजय को शस्त्रावरणी, बन्धनी और विमोचनी विद्या दी। उन्होंने शत्रु संहार के लिए ससैन्य रश्मिवेग, अमिततेज, रविवेग, अर्ककीर्ति, भानुवेग, आदित्ययश, भानु, चित्ररथ, अर्कप्रभ, अर्करथ, रवितेज, प्रभाकर, किरणवेग, सहस्रकिरण आदि अपने पचास हजार पुत्रों को अशनिघोष के हाथों से सुतारा का उद्धार करने के लिए चमरचंचा भेजा। त्रिपृष्ठपुत्र श्रीविजय तब विद्याधर सैन्य से आकाश को आच्छादित कर चमरचंचा पहुंचे। सेना के अस्त्रों की चमक से मानो आकाश में हजार-हजार धूमकेतु उदित हुए हैं, ऐसा प्रतीत होने लगा। उनके अश्वों के ह्र श्वारव से सूर्यरथ के अश्व भी ह्रश्वारव कर उठे । हस्ती यूथ से आकाश में मानो द्वितीय मेघमाला विस्तृत हो गई हो, ऐसा भ्रम होने लगा। (श्लोक २९२-३०१) ___ अशनिघोष को विद्या का अधिकारी समझकर जब कि अमिततेज भी किसी अंश में उससे कम नहीं थे, फिर भी महाज्वाला विद्या अधिगत करने के लिए वे पुत्र सहस्ररश्मि सहित हिमवन्त पर्वत पर चले गए। महाज्वाला विद्या शत्रु की समस्त विद्याओं को नष्ट कर देती है। वहाँ वे जहाँ ऋषि जयन्त प्रतिमा धारण किए हुए थे वहीं उनके चरणों के समीप धरणेन्द्र को स्मरण कर एक मास के उपवास के पश्चात् सात दिनों की प्रतिमा धारण कर विद्या प्राप्त करना प्रारम्भ किया। सहस्ररश्मि अपने पिता की रक्षा करने लगे। इस प्रकार एक मास से अधिक समय व्यतीत हो गया। (श्लोक ३०२-३०७) ___ श्री विजय चमरचंचा नगरी के बाहर सैन्य सह अवस्थित हुए और अशनिघोष के पास दूत भेजा। दूत अशनिघोष के पास जाकर निर्भयतापूर्वक बोला-'कौए की भाँति जो घणित कार्य तुमने किया है उसके लिए तुम्हें धिक्कार है । जिसमें शक्ति व साहस का अभाव है वह यदि स्वयं को मनुष्य समझता है तो यह उसका
SR No.090516
Book TitleTrishashti Shalaka Purush Charitra Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGanesh Lalwani, Rajkumari Bengani
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year1992
Total Pages230
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, Story, & Biography
File Size17 MB
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