________________
[१५९
अनशन ग्रहण किया। एक मास दशमी को चन्द्र जब रेवती नक्षत १००० मुनियों सहित निर्वाण ( श्लोक ३८३ - ३८४ )
सम्मेत शिखर पर गए और वहां पश्चात् अगहन महीने की शुक्ला में अवस्थान कर रहा था तब उन को प्राप्त हुए ।
भगवान २१००० वर्ष कुमारावस्था में, २१००० वर्ष आंचलिक राजा के रूप में, २१००० वर्ष चक्रवर्ती रूप में, २१००० वर्ष व्रत पर्याय में इस प्रकार कुल ८४००० वर्ष तक मृत्युलोक में अवस्थित रहे । भगवान अरनाथ का निर्वाण भगवान कुन्थुनाथ के निर्वाण से १००० करोड़ वर्ष कम एक चतुर्थ पल्य के बाद हुआ । इन्द्रादि देव वहां आए और भगवान अरनाथ एवं अन्य मुनियों की देह का संस्कार कर उनका निर्वाण महोत्सव किया ।
( श्लोक ३८५-३८७)
द्वितीयसर्ग समाप्त
तृतीय सर्ग
अब, भगवान अरनाथ के शासनकाल में जिन षष्ठ बलदेव, षष्ठ वासुदेव और प्रतिवासुदेव वलि ने जन्म ग्रहण किया उनका वर्णन करता हूं | ( श्लोक १ ) विजयपुर में सुदर्शन नामक एक राजा थे । वे चन्द्र की भांति सुन्दर थे और पृथ्वी के लिए आनन्द स्वरूप थे । मुनि दमधर से जैन सिद्धान्त श्रवण कर उनके मन में संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ । अतः उन्होंने उनसे दीक्षा ग्रहण कर ली । दीर्घ समय तक तप, आराधना कर वे सहस्रार स्वर्ग में देव रूप में उत्पन्न हुए ।
( श्लोक २ - ३ )
इसी भरतक्षेत्र में पोतनपुर नामक एक नगरी थी । कमल के लिए जिस प्रकार उदीयमान सूर्य है उसी प्रकार मित्रों के लिए मित्र रूप प्रियमित्र नामक एक राजा वहां राज्य करते थे । एक समय सुकेतु नामक एक बलवान् राजा ने उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया । इस अपमान से वितृष्ण होकर उन्होंने मुनि वसुभूति से दीक्षा ग्रहण कर ली । पत्नी के हरण से दुःखी होकर उन्होंने कठोर तप कर यह निदान किया कि वे उसके प्रभाव से पत्नी का