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किया ।
( श्लोक १४६ - १५२ ) पान और सुपारी के वृक्षों से समाच्छादित समुद्र तट पर शान्तिनाथ ने तम्बू डाला । आसन कम्पित होने से प्रभास तीर्थाधिपति वहां आए और सिंहासन स्थित शान्तिनाथ का स्वागत कर उनकी अधीनता स्वीकार कर ली । चक्र अब उत्तर पश्चिम पथ पर सिंधु नदी की ओर चलने लगा एवं चक्री उसका अनुसरण करते हुए पीछे-पीछे चलने लगे । सिन्धु देवी के प्रासाद के निकट सिन्धु नदी के दक्षिण तट पर चलायमान नगरी की तरह उन्होंने छावनी डाली । सिंहासन पर बैठकर सिन्धु देवी की ओर देखते हुए योगी जैसे किसी को आकृष्ट करने के लिए ध्यान करता है उसी प्रकार ध्यान करने लगे । अवधि ज्ञान से स्वामी का आगमन जानकर संगृहीत उपहार लेकर भक्तिभाव से सिन्धु देवी उनके सम्मुख उपस्थित हुई । तदुपरान्त वे करबद्ध होकर बोलीं, आपके सेनाध्यक्ष जैसे आपकी आज्ञा का पालन करते हैं उसी प्रकार मैं भी अब आपके आदेश का पालन करूंगी।' ऐसा कहकर उन्हें पुनः प्रणाम कर पृथ्वी के स्वर्ण, रत्न, स्नान के लिए पादपीठ, कुम्भ और अलङ्कारादि उपहार दिए । ( श्लोक १५३-१६० ) वहां से चक्र का अनुसरण करते हुए चक्री ने उत्तर पूर्ण की ओर प्रयाण किया और वैताढ्य पर्वत के सम्मुख पहुंचे । वैताढ्य देव ने शान्तिनाथ को उपहार देकर उनकी अधीनता स्वीकार कर ली । ( श्लोक १६१ - १६२ )
चक्र का अनुसरण करते हुए शान्तिनाथ तमिस्रा गुहा के निकट पहुंचे और कृतमालदेव को अपने अधीन कर लिया । शान्तिनाथ के आदेश से सेनापति ने चर्म रत्न की सहायता से सिन्धु नदी अतिक्रम कर सिन्धु का दक्षिण भाग जीत लिया । तदुपरान्त सेनापति ने दण्ड रत्न की सहायता से तमिस्रा के उभय द्वार को खोल दिया । हस्तीरत्न पर आरूढ़ होकर चक्रवर्ती तब अपने वर्द्धित होते प्रताप को लेकर सैन्य सहित सिंह की भांति उस गुफा में प्रविष्ट हुए । अन्धकार दूर करने के लिए सूर्य जैसे पूर्वाञ्चल पर आरोहण करता है उसी प्रकार उन्होंने मणिरत्न को हस्ती के दक्षिण 'कुम्भ देश पर रखकर गुफा के दोनों ओर ४९ मण्डलों का निर्माण करते हुए वे अग्रसर हुए । तदुपरान्त गुहा के अभ्यन्तर स्थित उन्मग्ना