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________________ २२०] लक्ष्मीगृह में कांकिणी रत्न, चर्मरत्न, मणिरत्न और नव निधियां थीं । अपने नगर में उत्पन्न सेनापति, गृहपति, पुरोहित और वर्द्धकि ये चार नर-रत्न थे । वैताढ्य पर्वत के मूल देश में उत्पन्न गजरत्न और अश्वरत्न थे । विद्याधर श्रेणी में उत्पन्न एक स्त्री - रत्न था । नेत्रों को प्रानन्दप्रदानकारी आकृति में वे चन्द्रमा से सुशोभित होते और दुःसह प्रताप से सूर्य के समान प्रतिभासित होते । पुरुष रूप में उत्पन्न समुद्र हों वैसे उनका अन्तःस्थल दुरधिगम्य था । कुबेर की भांति उन्हें मनुष्यों का प्रभुत्व प्राप्त हुआ था । जम्बूद्वीप जिस प्रकार गङ्गा, सिन्धु आदि नदियों से सुशोभित होता है उसी प्रकार वे पूर्वोक्त चौदह रत्नों से सुशोभित होते थे । विहार करते समय जिस प्रकार ऋषभदेव के पैरों तले नौ स्वर्ण कमल रहते थे उसी प्रकार उनके पैरों तले नौ निधियां रहती थीं । बहुमूल्य क्रीत आत्मरक्षकों की भांति सोलह हजार पारिपार्श्विक देवतानों द्वारा वे परिवृत रहते थे । बत्तीस हजार राजकन्याओं की तरह बत्तीस हजार राजा परिपूर्ण भक्ति से उनकी उपासना करते । बत्तीस हजार नाटकों की तरह बत्तीस हजार देशों की बत्तीस हजार कन्याओं के साथ वे रमण करते थे । संसार में श्रेष्ठ राजा तीन सौ त्रेसठ रसोइयों से उसी प्रकार शोभित थे जैसे तीन सौ तेसठ दिन से वत्सर शोभित होता है । अठारह लिपि प्रवर्तक भगवान् ऋषभ की तरह अठारह श्रेणियोंउपश्रेणियों द्वारा पृथ्वी पर उन्होंने लोक व्यवहार प्रचलित किया था । वे चौरासी लक्ष हस्ती, चौरासी लक्ष घोड़े, चौरासी लक्ष रथ और छियानवे कोटि ग्राम और इतनी हो संख्या के पदातिकों से शोभित होते थे । वे बत्तीस हजार देश और बत्तीस हजार वृहद् नगरों के अधीश्वर थे । निन्यानवे हजार द्रोणमुख और अड़तालीस हजार दुर्ग के वे अधिपति थे । वे प्राडम्बरयुक्त श्रीसम्पन्न चौबीस हजार खर्बट, चौबीस हजार मण्डप और बीस हजार प्राकरों के स्वामी थे । सोलह हजार खेटक पर वे शासन करते थे । वे प्रभु चौदह हजार संवाह और छप्पन हजार द्वीपों के एवं उनचालीस कुराज्यों के नायक थे । इस प्रकार वे समस्त भरत क्षेत्र के शासनकर्त्ता अधीश्वर थे । ( श्लोक ७०९-७२८) अयोध्या नगरी में निवास करते समय अखण्ड अधिकारी भरत महाराज अभिषेक उत्सव समाप्त होने पर एक दिन जब निज आत्मियों की याद करने लगे तब अधिकारी पुरुषों ने साठ हजार
SR No.090513
Book TitleTrishashti Shalaka Purush Charitra Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGanesh Lalwani, Rajkumari Bengani
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year1989
Total Pages338
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, Story, & Biography
File Size24 MB
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