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________________ ७१२ त्रिलोकसा पाया १२८ जबकि पर्वतों को शुद्ध शलाका १८ का ४ ला० x ६४ योजन क्षेत्र प्रा होता है, तब ३६० मिश्र शलाकामों का कितना क्षेत्र प्राप्त होगा ? इस प्रकार राशिक करने पर ला•४८४४ ३८० योजन प्राप्त हुए। यहां इच्छा राशि ३८० को दो से सभेद्यने पर १९० रहे और ८४ को दो से गुणित करने पर १६८ हुए अतः ४ ला.xkxयोजनों का परस्पर में संभेय करने पर पातका त्रा का मिश्र क्षेत्रफल ४ लाख योजन का हुआ। षकि ३८० विश्रशलाकाओं का क्षेत्र ४००००. योजन होता है, तब पातकी भण्डस्थ पर्वतों को शुद्धधलाका १६८ का कितना क्षेत्रफल होगा ? इस प्रकार शशिक करने पर ४ला० x १६८ योजन प्राप्त हये । इन्हें दो से अपवर्तन कर ला०४६४ योजन हुए। ४..... लाख को ८४ से गुणित कर ( 420 ) अपने भागहार का भाग देने पर १५१८४२३ योजन हुए। इनमें से सरकारों का कारः २००८ औजा। पिता और १७८४२२ पोजन धातकी खण्ड के पर्वतों द्वारा अवरुद्ध क्षेत्र प्राप्त हो जाता है और इसी प्रमाण को दूना कर दो इष्वाकारों का ध्यास २०.० योजन मिला देने पर ( १७०८४२१. ४२-३५३६८४ +२०००-३५५६८४ योजन पुष्कराध द्वीप के पर्वतों द्वारा अवरुद्ध क्षेत्र का प्रमाण प्राप्त हो जाता है। अब क्षेत्रव्यास प्राप्त करने को कहते हैं :-धानको भण्ड के व्यास ४ लाख योजन को तीन जगह स्थापन कर "लवणादीणं वाम" गाया ३१० के अनुमार धातकी खण्ड को कवण मन के निकट आदि सूची ५ लाख योजन, मध्य में मध्यम सूफी ध्यास ९ लान योजन और कालोदक समुद्र के निकट बाह्य सूची व्यास १३ लाख योजन प्राप्त होता है । यथा :-विवक्षित समुद्र या द्वीप के व्यास को दो, लीन और चार से गुरिणत कर प्रत्येक में से ३ घटा देने पर कम से अभ्यन्तर, मध्य मौर बाल सूची ध्यास होता है। ( गा० ३१०) अत:-ल.४२८ल. --- ३०५ लाब योजन पातकी खण्डका सम्पन्तर सूची व्यास । ४०.४३=१२ल० - ३ ल०६ ल न यो० मध्यम सूची व्यास और ४ला.x ४-१६म.- ३ल०-१३ लाख यो. बाह्य सूची व्यास है। शासकी खण्ड के उपयुक्त प्रकार से प्राप्त हए अभ्यन्तर, मध्यम और बाह्य सूची भ्यास का "विष्कम्भवम्गदहगुणकरणो" गाथा ६६ के अनुसार वर्ग कर उसे दश से गुणित करने पर वर्गरूप अम्यातर परिधि का प्रमाण (५ला.४५ला.४१.)=२५००००००००००० योजन, वर्गरूप मध्यम परिधि का प्रमाण (ला.xkal.x१०)-८१०००.0.... योजन और वर्गरूप बाह्य परिधि का प्रमाण ( १३का.x१३ला०x१. )=१६६.०००००००००० योजन प्राप्त होता है। इन.तीनों का मथारूम वर्गमूल ग्रहण करने पर घातकी स्त्रण्ट की अभ्यन्तर परिधि १५८१९३९ योजन, मध्यम परिधि २८४६:५० योजन मोर बाझ परिषि ४११०६६१ योजन हुई। इन तीनों परिधियों में से पहले प्राप्त किए घातको सब के एवंत अवरुद्ध क्षेत्र का प्रमाण १०८८४२११ योजन घटा देने पर यथाक्रम अभ्यन्तर परिधि में पर्वतरहित क्षेत्र का प्रमाण (१५८११३९ -- १७८८४२१-१४०२१९६५५ योजन, मध्यम परिधि में (२८४६०५.-१७८८४२१९ ) =२६६ २०७१ योजन और शाह्य परिधि
SR No.090512
Book TitleTriloksar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Ratanchand Jain, Chetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages829
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size19 MB
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