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________________ त्रिलोकसा पापा : ६१४ अप मेरोश्चित्रातव्यासानयने नन्दनसौमनससमन्द्रामिक्षेत्रव्यासोदयानयने च हानिचयामयनार्थ गाथाद्वयमा । तत्र प्रथमिदे राशिक शेयम् तद्यथा- मेरोमुख १००० तद्भूमी १.००० विशेषयित्वा १०० एतावतो मैरूदयस्य . एतावति हानिचये ९००० एकयोजनस्य कियदानि चयमिति सम्पात्य नवभिरपयतिते एवं एतानिचयं धृत्वा पश्चात् अपरत्रैराशिकविधानमुच्यते यदि जोपन शायभागी अदि पडदे हायदि वा । सलणंदणसोमणसे किमिदि चयं हाणिमाणिज्जो ।। ६१४ ॥ इति योजनस्य एकादयाभागः यदि वर्धते प्रहीयते वा। तलनन्दन सोमनसे किमिति चयं हानिरानेतव्यम् ।। ६१४ ।। इदि । एक योजनोवयस्य १ एफयोजनकादशभागो पति वर्धते प्रहीयते पातबा मेहतालनन्यनसीमनसानामुक्यस्य १.० | ५०० ।५१५०० कियववर्षते प्रहीयते चेति सम्पारम हानिधयमानेसम्य। तलम्यासे वि०१७ नन्दने हानि: ४५१ सौमनसे हामिः ४६८१६ ॥ ६१४ ॥ अब चित्रा पृथ्वी के तल में स्थित मेक का व्यास लाने के लिए नन्दन, सौमनस आदि से कट क्षेत्र का व्यास एवं इनके पास मेरु की ऊंचाई आदि का प्रमाण प्राप्त करने के लिए तथा हानिचय का प्रमाण प्राप्त करने के लिए दो गाथाएं कहते हैं । यहाँ सर्व प्रथम ऐसा पैराशिक जानना कि तद्यथा :-मेरु को भूमि १.... योजन और मुख १०.० योजन प्रमाण है। भूमि में से मुख घटा देने पर { १०००० - १०००) ९.०० योजन अवशेष रहे। मेरू पवंत की ऊंचाई का प्रमाण ६९...योजन है, अतः जब कि .... योजन पर ६००० योजन की हानि होती है, तब १ योजन पर कितनी हानि होगी? इस प्रकार पैराशिक करने पर (2x'= योजन हानिचय का प्रमाण प्राप्त हुआ। इस यो हानिचय को रख कर अन्य राशिक विधान कहते है। गापा :-( ज क ) एक योजन की ऊंचाई पर योजन घटता या बढ़ता है, तब तल भाग,नन्दन वन और सौमनस वन की ऊंचाई पर कितनी हानि अथवा वृद्धि होगी? इस प्रकार राशिक द्वारा हानि वृद्धि प्राप्त करना चाहिये ।। ६१४॥ विशेषा:-जो ऊपर से नीचे की और घटता है उसका नाम हानि है, और जो नीचे से ऊपर को पोर वृद्धिंगत होता है पसका नाम वृद्धि है । जबकि एक योजन पर की योजन वृद्धि या हानि होती है, तब मेरु के सल की ऊंचाई १८०० योजन. नन्दन बन की ऊंचाई ५०० योजन [ नन्दन वन पर सब ओर १.० योजन चौड़ी फटनी है । चौड़ाई में एक साथ एक हजार ( दोनों ओर के पांच, पांच सौ ) योजन हानि हो जाने के कारण ग्यारह हजार योजन तक हानि नहीं होती । और समरुन्द्र
SR No.090512
Book TitleTriloksar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Ratanchand Jain, Chetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages829
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size19 MB
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