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________________ निलोफसाद गाथा: ५३७-५३६ सात हजार सात हैं। इनसे ऊपर दो स्थानों में क्रम से दो हजार दो की वृद्धि को लिए हुए हैं। इसके बाद गतंतोय, तुषित, अध्यावाघ और अरिष्ट नामके लोकान्तिक देव हैं। इनमें से अरिष्ट नाम के लौकान्तिक देव श्रेणीबद्ध विमानों में तथा शेष प्रकीर्णकों में रहते हैं ॥ ५३५, ५३६ ।। विशेषाय:-सारस्वत नाम के लौकान्तिक देवों का प्रमाण ७०७ है। आदित्य लोकान्तिक ७०७, वह्नि ७००७, अरुण ७.०७, गदतोय ९००१, तुषित ९००९, अन्यावाध ११०११ और मरिष्ट नामक लौकान्तिक देवों का प्रमाण भी ११.११ है । भाठ कुलों के सम्पूर्ण लोकान्तिक देवो का प्रमाण ५५४६८ अर्थात् पचपन हजार चार सौ अड़सठ है। इनमें से ११०११ अरिष्ट देव श्रेणीबद्ध विमानों में और शेष ४४४५७ लोकान्तिक देव गोल आकार वाले प्रकीर्णक विमानों में निवास करते हैं। इनके विमान कम से ऐशानादि आठ दिशाओं में अवस्थित हैं। अथ सारस्वतादीनां द्वयोः योरन्तरालस्म कुलनामानि तवसंख्यां गाथातयेनाह सारस्सदआइच्चप्पहुदीणं अंतरालए दोदो । जाणग्गिरचंदयसच्चामा सेयखेमकरा ॥ ५३७ ।। वसहिदुकामघरणिम्माणरबा दिगंत पप्पसवादी। रखिदमरुबसुअस्सविसापढमरुणसम पुग्वचयमुबारि ५३८|| सारस्वतादिस्यप्रभृतीनां अन्तरालफेद हूँ । जानीहि अग्निसूर्यचन्द्र कसत्याभाः श्रेयः क्षेमकराः ।। ५५७ ।। वृषभेष्टकामधरनिर्माण रजोदिगन्तात्मसर्यादि।। रक्षितमरुद्धस्वश्व विश्वाः प्रश्रमा अरुणसभाः पूर्वचयमुपरि ॥१३८।। सारसब। सारस्वताविस्यप्रभृतीनामस्वन्तरालेषु कुले नानीहि । सस्कुलस्पा के ? प्रग्यामा सूर्याभाः पनामा: सस्थाभा: पस्कराः क्षेमराः ॥ ५३७ ॥ साह 1 पृषभेष्टा: कामरा निर्माणरमस: दिगन्तरक्षिताः पामरक्षिताः सर्वामिता; मरुतः बसब प्रकार विश्वाः एते स्वस्वकुलनामाथिताः । तत्र प्रथमान्याभकुलस्पा परणसमा: 10 पत्य प्रमाणस्योपरि पूर्वचये प्रषिकविसहस्र २०.२ मिलिते सोमादीनां संख्या भवति ॥५३८॥ ___अथ सारस्वतादि दो दो फूलों के अमराल में स्थित फूलों के नाम और उन देवों की संख्या दो गापाओं द्वारा कहते हैं : नाया:-सारस्वतादित्य आदि आठ कुलों के अन्तरालों में दो दो कुल जानो। वे कुल १ अग्न्याभ, २ सूर्याभ, ३ चन्द्राभ, ४ सत्माभ, ५ श्रेयस्कर, ६ क्षेमकर, ७ वृषभेष्ट, ८ कामघर, निर्वाण एजस्, १० दिगन्तरक्षित, ११ मास्मरक्षित. १२ सवंरक्षित, १३ मरुत्, १४ वसु,
SR No.090512
Book TitleTriloksar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Ratanchand Jain, Chetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages829
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size19 MB
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