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________________ गाथा : २९४-२२४ व्यन्तरलोकाधिकार नीचोपपाद व्यन्तर देवों को आयू का प्रमाण दस हजार वर्ष, दिग्यासी का बीस हजार, अन्तरवासी का तीस हबार, कृष्माण्ड का चालीस हजार, उत्पन्न का पचास हजार, अनुत्पन्न का साठ हजार, प्रमाणक का सत्तर हजार, गन्ध का अस्सी हजार, महागन्ध का चौरासी हजार, भुजल देवों का पल्य के आठवें भाग, प्रीतिक का पल्य के चतुर्थ भाग प्रमाण और आकाशोत्पन्न देवों की आयु का प्रमाण पल्य के अर्धभाग प्रमाण है। अथ ध्यन्त राणा निलयभेदमाह वितरणिलयतिपाणि य भवणपुरावासमवणणामाणि । दीवसमुद्दे दहगिरितरुम्हि चिचावणिम्हि कमे ।।२९४॥ व्यन्तरनिलपत्रयाणि च भवनपुरावासभवननामानि । द्वीपसमुद्रे द्रगिरितरी चित्रावन्या क्रमेण ॥२६४।। वितए । उपन्तराणा निलययाणि च भवनपुरावास पनि मानि । इह फुत्र कुति वेत् । दीपसमुद्रे ह्रगिरितरो चित्रावत्या च मेण भवन्ति ॥२६४।। स्यम्तरदेवों के निलय भेद पामार्थ:----व्यन्तरदेवों के निवास स्थानों के तीन नाम हैं:--भवनपुर, भावास और भवन । ये * सोनों क्रमशः द्वीपसमुद्र, तालाब पर्वत और चित्रा पृथ्वी में स्थित हैं ॥२६४।। विशेषार्थ:--व्यन्तरदेवों के निवास स्थान तीन प्रकार के हैं-भवनपुर, आवास और भवन । भवनपुर द्वीप समुद्रों में स्थित है । आवास तालाब, पवंत और वृक्षादि पर तथा भवन चित्रा पृथ्वी के नीचे स्थित हैं। अथ निलय त्रयं विवृणोति उड्ढगया आवासा अधोगमा वितरण भवणाणि । भवणपुराणि य मज्झिमभागगया इदि तियं णिलयं ॥२९शा ऊध्वंगता; आवासा अधोगता अन्तराणा भवनानि ।। भवनपुराणि च मध्यमभागमतानीति अयं निलयम् ॥२९॥ उड्ढगया। छायामाप्रमेवार्थः ॥२९॥ तीनों प्रकार के निलयों का वर्णन करते हैं पाथार्य:-व्यन्तरदेवों के जो निवास स्थान मध्यलोक की समभूमि पर है, उन्हें भवनपुए कहते हैं। जो स्थान पृथ्वी से ऊँचे हैं उन्हें आवास तथा जो स्थान पृथ्वी से नीचे हैं, उन्हें भवन कहते हैं ॥ २६५ ॥
SR No.090512
Book TitleTriloksar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Ratanchand Jain, Chetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages829
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size19 MB
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