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________________ त्रिलोकसार पहली पृथ्वी के अन्तिम पटल और दूसरी पृथ्वी के प्रथम पटच का अन्तराल: गाथार्थ: - ऊपर की धर्मा पृथ्वी के अन्तिम पटल से नीचे की वंशा पृथ्वी के प्रथम पटल तक का अन्तर तीन हजार कम धर्मा और वंशा पृथ्वी के बाहुल्य से हीन एक राजू प्रमाण हैं ।। १७३२ १८० पापा । १७४ विशेषार्थ:- प्री की सोई दिलीय पृथ्वी की मोटाई ५२००० मोजन प्रमाण है । इन दोनों का योग २१२००० योजन प्रमाण है। इसमें से प्रथम पृथ्वी के ( दो हजार ) २००० योजन और द्वितीय पृथ्वी के १००० योजन इस प्रकार कुल तीन हजार योजन ( २००० ) कम कर देने चाहिए, क्योंकि चित्रा पृथ्वी की मोटाई एक हजार योजन है, जो कि प्रथम पृथ्वी को मोटाई में सम्मिलित है, किन्तु उसको गणना उध्वंलोक की मोटाई में की गई है। अतएव १००० योजन चित्रा पृथ्वी के और प्रथम पृथ्वी के नीचे तथा द्वितीय पृथ्वी के ऊपर एक एक हजार योजन में बिल नहीं हैं, अतः २००० + १००० = ३००० योजन हुए। इन्हें २१२००० योजन बाहुल्य में से घटाने पर (२१२००० - ३००० ) २०९००० योजन प्राप्त होते हैं। इनको एक राजू में से घटा ( १ राजू२०९००० योजन ) कर जो अवशेष रहे वही प्रथम पृथ्वी के अन्तिम पटल से द्वितीय पृथ्वी के प्रथम पटल के बीच का अन्तराल है । अथ ततोऽप्यsunset भूनोनां पटलयोरन्तरं निरूपयति कमसो बिसहरनियमेघादीणं च वेहपरिक्षीणा | चरिमे बितिमागाद्दियजोयणनिसहरुमपरिवज्जा ॥ १७४॥ | म सिहोनिनमेघादीनां च मेधपरिहीना । चरमे द्वित्रिभागाधि कयोजनविसहस्रपरिवज ।। १७४।। कमसो । क्रमशोद्विसहस्रोतिमेधाबीन व वेत्र २८०००-२००० । २४०००-२००० | २००००२००० । १६०००-२००० परिहोना परमान्तरानयने द्वित्रिभागा टु बिरुयोजनात्रिहरू परिवजिला' जुः । वितिभागाहीय इत्यादेर्वासनोपते । सप्तम पृथ्वीबाहुल्ये ८००० गोटवाध्यं प्रपतत श्रेणीबद्ध बाहुल्यं समन २४०० प्रपनीय ३३ प्रकृत्य भरवा ३६६ पट्टभिश्यपस्तनपटलाधः सहस्रमत्र मेलयिषा ४६६६ ] हवं सप्तम पृथ्वीबाहुल्ये ८००० हटने ३००० तहासना भवति ॥१७४॥ मोमीकृत्य अत्र नीचे नीचे की पृथ्वियों के व्ययदि अन्त पटलों के अन्तर का निरूपण करते हैं- : गावार्थ:- अनुक्रम से मेघादि पृथ्वियों के आदि अन्त पटलों का अन्तर २००० यीजन में हीन प्रत्येक पृथ्वी के बाहुश्य से कम एक राजू प्रमाण है तथा असिम पृथ्वी के आदि अन्त पटलों का अन्तर ३०००३ योजन कम एक राजू प्रमाण है ।। १७४ । । १. परिवर्धा (म० ) ।
SR No.090512
Book TitleTriloksar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Ratanchand Jain, Chetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages829
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size19 MB
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