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इसके दो अंग हैं - बादी और प्रतिवादी । आभिमानिकवाद जिगीषुओंमें होता है और उसके वादी प्रतिवादी, सभापति और प्राश्निक - ये चार अङ्ग हैं | अभिमानिकवाद के भी दो भेद हैं- (१) तात्त्विकवाद और (२) प्रातिभवाद | अपने इस वादसम्बन्धी कथन की पुष्टि के लिए श्रीदत्तके मतका उपस्थापन किया है । जल्पके भी तात्विक और प्रतिभ ये दो भेद किये गये हैं। इस प्रकार विद्यानन्दने अपने से पूर्ववर्ती श्रीदत्त और उनके 'जल्पनिर्णय' ग्रन्थका उल्लेख किया है ।
आचार्य जिनसेन द्वितीयने श्रीदत्तका स्मरण किया है और जिनसेनका समय ई० सन् नौवीं शताब्दि है । अतः श्रीदत्तका समय इनसे पहले होना चाहिए । आचार्य पूज्यपादने अपने जैनेन्द्र व्याकरणके "गणे श्रीदत्तस्य स्त्रियां "" सूत्र द्वारा श्रीदत्तका उल्लेख किया है। यदि ये श्रीदत्त ही प्रस्तुत श्रीदत्त हों तो श्रीदत्तका समय पूज्यपादसे पूर्व अर्थात् छठी शताब्दिसे पूर्व आता है | अतः इस आधारसे विद्यानन्दका समय छठीं शताब्दिके बाद सिद्ध होता है ।
विद्यानन्द ने 'तत्त्वार्थरलोकवातिक' में सिद्धसेनके सम्मतिसूत्रके तीसरे काण्डगत "जो हेउवापक्वम्मि" आदि ४५वीं गाथा उद्भुत की है । एक दूसरी जगह "जाबदिया वज्रणवहा तावदिया होंति णयवाया" आदि तीसरे काण्डको ४७वीं गाथाका संस्कृतरूपान्तर दिया है। अतः विद्यानन्द सिद्धसेन के पश्चादुवर्ती हैं, यह स्पष्ट है । पात्रस्वामी और भट्टाकलङ्कके उद्धरण और नामोल्लेख भी इनके ग्रन्थों में मिलते हैं। अकलङ्ककी 'अष्टशतो' को तो अष्टसहस्री में आत्मसात् ही कर लिया गया है। अतएव इनका समय सातवीं शताब्दिके पश्चात् होना चाहिए। अकलङ्कके उत्तरवर्ती कुमारनन्दि भट्टारकके वादन्यायका 'तत्त्वार्थश्लोकवार्त्तिक', 'प्रमाणपरीक्षा' और 'पत्रपरीक्षा' में नामोल्लेख किया है, तथा वादन्यायसे कुछ कारिकाएं भी उद्धृत की हैं। अतः विद्यानन्द कुमारनन्दि भट्टारकके उत्तरवर्ती हैं । कुमारनन्दि अकलडू और विद्यानन्दके मध्यमें हुए हैं । अतः इनका समय आठवीं और नौवीं शताब्दिका मध्यभाग होना चाहिए ।
विद्यानन्दका प्रभाव माणिक्यनन्दि वादिराज, प्रभाचन्द्र, अभयदेव, देवसूरि आदि आचार्यो पर है । माणिक्यनन्दिका समय विक्रमकी ११ वीं शती है और अकलंकदेवका समय विक्रमकी ८ वीं शती है। अतएव विद्यानन्दका समय माणिक्यनन्दि और अकलंकका मध्य अर्थात् ९ वीं शती होना चाहिए । १. जैनेन्द्रध्याकरण १।४।३४ ।
२. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, ३. वहीं, पु० ११४
पृ० ३ ।
३५०: तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा