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________________ मूलाचारका अथन एक निश्चित रूपरेखाके आधारपर हुआ है। अत: उसके सभी प्रकरण आपस में एक दूसरेसे सम्बद्ध है। यदि यह संकलन होता, तो इसके प्रकरणोंमें आद्यन्त एकरूपता एवं प्रौढ़ताका निर्वाह सम्भव नहीं था। अतएव आचार्य वट्टकेरका समय कुन्दकुन्दके समकालीन या उनसे कुछ ही पश्चाद्वर्ती होना चाहिए। वस्तुतः प्राचीन गुरुपरम्परामें ऐसी अनेक गाथाएं विद्यमान थी, जो दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों ही मान्यताओंक ग्रन्थोंका स्रोत हैं । एक ही स्थानसे अथवा गुरूपरम्पराके प्रचलनसे गाथाओंको ग्रहण कर, दिगम्बर और श्वेता. म्बर दोनों ही मान्यताओंके आचार्योने समानरूपसे उनका उपयोग किया है । मुनि-आचार-सम्बन्धो, या कर्मप्राभूत-सम्बन्धी जिन सिद्धान्तों में मतभेद नहीं था, उन सिद्धान्तों सम्बन्धी माथाओंको एक हो स्रोतसे ग्रहण किया गया है । तथ्य यह है कि परम्पराभेद होने के पूर्व अनेक गाथाएँ आरातियोंके मध्य प्रचलित थीं, और ऐसे कई आरातोय थे, जो दोनों ही सम्प्रदायोंमें समानरूपसे प्रतिष्ठित थे । अतः वर्तमानमें मूलाचार, उत्तराध्ययन, दशवेकालिक प्रभृति ग्रन्थोंमें उपलब्ध होनेवाली समान गाथाओंका जो अस्तित्व पाया जाता है, उसका कारण यह नहीं है कि वे गाथाएँ किसी एक सम्प्रदायके ग्रन्थोंमें, दूसरे सम्प्रदायके ग्रन्थोंसे ग्रहण की गयी हैं, बल्कि इसका कारण यह है कि उन गाथाओंका मूल स्रोत अन्य कोई प्राचीन भाण्डार रहा है, जो प्राचीन श्रुतपर. म्परामें विद्यमान था। बट्टकेर आचार्यका यही एक सन्य उपलब्ध है। इसमें १२ अधिकार और १२५२ गाथाएँ हैं । पहले मूलगुण-अधिकारमें पांच महावत, पाँच समिति, पंचइन्द्रियोंका निरोध, षटआवश्यक, केशलञ्च, अचेलकत्व, अस्नान, क्षितिशयन, अदन्तधावन, स्थित-भोजन और एक बार भोजन, इस प्रकार मुनिके अट्ठाईस मूलगुणांका निरूपण किया है। बहत्प्रत्याख्यानसंस्तव-अधिकारमें क्षपकको समस्त पापोंका त्यागकर मत्युके समयमै दर्शनाराधना आदि चार आराधनाओंमें स्थिर रहने और क्षधादि परोषहोंको जीतकर निष्कषाय होनेका कान किया है। संक्षेपमें प्रत्याख्यानाधिकारमें सिंह, व्याघ्र आदिके द्वारा आकस्मिक मृत्यु उपस्थित होनेपर कषाय और आहारका त्यागकर समताभाव धारण करनेका निर्देश किया है। सम्यक्आचाराधिकारमें दश प्रकारके आचारोंका वर्णन है। आयिकाओंके लिए भी विशेष नियम वर्णित हैं। पंचाचाराधिकारमें दर्शनाचार, ज्ञानाचार आदि पाँच आचारों और उनके प्रभेदोंका विस्तार सहित वर्णन है। १२० : तीर्थकर महावीर और उनको आचार्य परम्परा
SR No.090508
Book TitleTirthankar Mahavira aur Unki Acharya Parampara Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherShantisagar Chhani Granthamala
Publication Year
Total Pages471
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size10 MB
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