SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 483
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ और अन्तर्व्याप्तिकी गणना है ।" सपक्ष में साध्य के साथ सावनको व्याप्ति होना बहिर्व्याप्ति है और पक्ष तथा सपक्ष दोनोंमें साध्य के साथ साधनकी व्याप्ति होना सकलव्याप्ति है। पक्ष, सपक्ष न हों अथवा उनमें हेतु न रहे - केवल साध्यके साथ साधनका अविनाभाव होनेसे अन्तर्व्याप्ति होती है । इन त्रिविध व्याप्तियोंमें आदि को दोनों व्याप्तियों होनेपर भीमनमें अन्तर्व्याप्ति के बलसे साधनको साध्यका गमक माना जाता है । अन्तर्व्याप्तिके अभाव में अन्य दोनों व्याप्तियोंका सद्भाव निरर्थक है । यथा 'सश्यामः तत्पुत्रत्वात् इतरतत्पुत्रवत्' इस अनुमानमें बहिर्व्याप्ति और सकलव्याप्ति दोनों विद्यमान हैं, पर अन्तर्व्याप्तिके न होनेसे 'तत्पुत्रत्वात् ' हेतु 'श्यामत्व' साध्यका गमक नहीं है। इसी प्रकार 'उदेष्यति शकटं कृत्तिकोदयात्' इस अनुमानमें न बहिर्व्याप्ति है और न सकलव्याप्ति है, किन्तु साधनकी साध्यके साथ अन्तर्व्याप्ति होनेसे कृत्तिकोदय हेतु शकटोदय साध्यका गमक है | अतएव अन्तर्व्याप्ति ही नियामक है । १. 'साच त्रिधा - बहिर्व्याप्ति:' साकल्यष्यामि ः अन्तर्व्यामिश्चेति । "प्रमाचन्द्र, प्रमेयक० मा० ३।१५ पृ० ३६४; अकलंक, सिद्धिवि० ५१५, १६. प्रमाणसं ० का ० ३२, ३३, पृष्ठ १०६ | देवसूरि, प्र० न० त० ३१ ३८, ३९ । यशोविजय जनतकुंभा, पृष्ठ १२ । २. (क) पक्षीकृत एवं विषये साधनस्य साध्येन व्याप्तिन्तभ्यप्तिः, अन्यत्र तु बहिप्तिरिति । 'बहिः पक्षीकृताविषयादन्यत्र तु दृष्टान्तधर्माणि तस्य तेन क्याप्तिहिप्तिरभिधीयते । देवसूरि, प्रमाणनयत० ३१३९. (ख) पक्षे सपक्षे च सर्वत्र साध्यसाधनयो: व्याप्तिः सकलध्याप्तिः । - सि० वि० टी० टिप्प ५/१६, पृष्ठ ३४७. (ग) पक्ष एव साधनस्य साध्येन व्याप्तिरन्तर्व्याप्तिः । सिद्धो बहिरुदाहृतिः । स्यात्सवसद्भावेऽप्येवं न्यायविदो विदुः । ३. (क) अन्तर्व्याप्यैव साध्यस्य व्यर्था - वही, पृ० ३४६. - सिद्धसेन, न्यायाव० का० २०. (ख) विनाशी भाव इति वा हेतुनैव प्रसिद्धति । अन्तर्व्याप्तावसिद्धायां बहिर्व्याप्तिरसाधनम् । साकल्येन कथं व्याप्तिरन्त परित्या विना भवेत् । ---अकलंक, सि० वि० ५१५, १६, पृ० ३४५-३४७ । प्रमाणसं०-३२-३३. (ग) अम्सर्थात्स्या हेतोः साध्यप्रत्यायने शक्तावशक्तौ च वहिर्व्याप्तिरुद्भावनं व्यर्थम् - देवसूरि, प्र० न० त० ५३८, ०५६२. इति । ४४२ : तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य - परम्परा
SR No.090507
Book TitleTirthankar Mahavira aur Unki Acharya Parampara Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherShantisagar Chhani Granthamala
Publication Year
Total Pages654
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size14 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy