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हैं । तीर्थंकरोंके सन्देशसे प्रत्येक प्राणी अपने भाग्यका विधाता बन सतत पुरुषार्थ द्वारा परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकता है । यह तत्त्व सहज है, दुष्प्राप्य हैं, पर अप्राप्य नहीं । भीरु रहनेवाला परमात्मतत्त्वको प्राप्त नहीं हो सकता। इस प्रकार तीर्थंकरोंने मानव जीवनको प्रत्येक क्रियाको अहिंसा मापदंड द्वारा मापा है। जो किया अहिंसामूलक है, रागद्वेष और प्रमादसे रहित है, वह सम्यक् है और जो हिंसामूलक है वह मिथ्या है। मिथ्या क्रिया कर्म -बन्धनका कारण हैं और सम्यक क्रिया कर्मक्षयका । धार्मिक विधि-विधानामें हो अहिंसा की आवश्यकता नहीं है, अपितु जीवनके दैनिक व्यवहार में भी अहिंसा की आवश्यकता है !
तीर्थंकर अपने आचार और विचारसे पार्थिव जीवनको अपार्थिव तो बनाते ही हैं, साथ ही आत्मसाधनाका एक विशुद्ध और सुपरीक्षित मार्ग भी निर्धारित कर देते हैं। ये सत्यके अन्वेषण, आत्मसाक्षात्कार एवं सुलझी हुई अन्तर्दृष्टि द्वारा मानवताकी प्रतिष्ठा करते हैं। इतना ही नहीं, अपितु ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, आस्था और आत्मशोधनकी प्रक्रिया भी प्रस्तुत करते हैं। ये जीवन के सम्यक्त्वा उपदेश देते हैं और मनको निर्मल बनानेका उपाय बतलाते हैं । वास्तवमें तीर्थंकरोंकी यह परम्परा सुदूर प्राचीनकालसे चली आ रही है |
जैनधर्म और तीर्थंकर-परम्परा
जैनधर्म में मान्य तीर्थंकरोंका अस्तित्व वैदिक कालके पूर्व भी विद्यमान था | इतिहास इस परम्पराके मूल तक नहीं पहुँच सका है। उपलब्ध पुरातत्त्वसम्बन्धी तथ्योंके निष्पक्ष विश्लेषणसे यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि तीर्थकरोंकी परम्परा अनादिकालीन है। वैदिक वाङ्मय में वात- रशनामुनियों, केशीमुनि और व्रात्य क्षत्रियोंके उल्लेख आये हैं, जिनसे यह स्पष्ट है कि पुरुषार्थपर विश्वास करनेवाले धर्म के प्रगतिशील व्याख्याता तीर्थंकर प्राग ऐतिहासिक काल में भी विद्यमान थे । मोहन-जो-दड़ों के खडहरोंसे प्राप्त योगीश्वर ऋषभकी कायोत्सर्ग मुद्रा इसका जीवन्त प्रमाण है । यहाँसे उपलब्ध अन्य पुरातत्त्व सम्बन्धी सामग्री भी तीर्थकर परम्पराकी पुष्टि करती है । वैदिक संस्कृति में ही वेदोंकने सर्वोपरि महस्व देकर मानव ज्ञानकी पूर्ण प्रतिष्ठा नहीं हुई है, अपितु श्रमणसंस्कृति में भी वीतराग, हितोपदेशी और सर्वज्ञ तीर्थंकरकी प्रतिष्ठा कर मानवताको महत्त्व प्रदान किया है। दीपक स्वयं प्रकाशित होता है और दर्पण स्वभावतः स्वरूपावलोकनका अवसर प्रदान करता है । इसी प्रकार तीर्थंकर भी समस्त आमुष्मिकताओंसे ऊपर उठकर मानवताका सन्देश देते हैं । इनमें राम-द्वेषका स्पर्श भी नहीं रहता और इनका ज्ञान इतना निर्मल हो जाता है कि उसमें
तीर्थंकर महावीर और उनकी देशना : ३