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________________ झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह, अज्ञान, भ्रम, दुराचार, अविश्वास और आडम्बरको वृद्धि होती जा रही है। यज्ञोंमें निरपराध जोवित पशुओंको झोंका जा रहा है और उनके दुःसह चीत्कारसे मानवता आक्रान्त हो रही है । अतः मेरा कत्र्तव्य मुझे आत्म-साधनाको ओर प्रेरित कर रहा है।" परिणय-बन्धनसे स्पष्ट इनकार ___ महावीरके अनुचिन्तनने उनके विचारोंको परिपुष्ट किया और उन्होंने स्पष्ट रूपमें कलिंग-नरेश जितशत्रुकी अनिन्द्य सुन्दरी कन्या यशोदाके साथ विवाह करनेसे इनकार कर दिया और घोषित किया कि में आजन्म ब्रह्मचारी रहकर सत्यज्ञान प्राप्त करूंगा और उसका आलोक जन-जन तक पहुंचाऊँगा । मुझे समाजके विशाल भवनको नींवको दृढ़ करना है। मुझे देवताओंके मन्दिर नहीं बनाना है अपितु जन-जनके मानस-मन्दिरको सुसंस्कृत करना है । मानवशक्तिके होते हए अपव्ययको रोकना है। प्रत्येक बड़-चेतनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। किसीका किसीपर अधिकार नहीं है। सभी पदार्थ अपने परिणामी स्वभावके अनुसार उत्पाद-व्यय प्रौव्यकी प्रक्रिया द्वारा परिवर्तित होते हैं। महावीरका हृदय आध्यात्मिक क्रान्तिके विप्लवसे भर गया और वे सोचने लगे कि संसार में कोई किसीका नहीं है। सभी आत्माएँ स्वतन्त्र रूपसे कर्ता और भोक्ता हैं । जो जैसा करता है, उसे वैसा फल मिलता है । फल देनेवाला कोई अन्य व्यक्ति नहीं है। अत: वे अपने माता-पितासे आरम-निवेदन करने लगे "पूज्यवर ! मैं आपका पुत्र हैं, किन्तु आप ही बतलाइये कि इस संसारमें कौन किसका है ? संसारका प्रत्येक पदार्थ क्षणभंगुर है। जीवन अनित्य है, दुःखमय है । इस चरम सत्यसे इनकार नहीं किया जा सकता है। आत्मा अमर और शाश्वत है। परिवर्तन तो जगतका शाश्वत नियम है। यह चेतन और अचेतन दोनोंमें ही होता है, पर इतनी बात अवश्य है कि जड़में परिवर्तनको प्रतीप्ति शीन हो जाती है, जबकि चेतनगत परिवर्तनको प्रतीति शीच नहीं हो पाती है। यदि चेतनमें परिवर्तन न होता, तो आत्माका दुःखीसे सुखी होना और अशुद्धसे शुद्ध होना यह कैसे सम्भव हो सकता है ? जीवन और जगत में प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है, यह चरम सत्य है ।" । ___ "शरीर अनित्य है। धन और वैभव भी शाश्वत नहीं है। मृत्यु सदा सिरपर नाचती रहती है । न जाने किस क्षण श्वांस बन्द हो जायगी। जिस दिन बालक जन्म ग्रहण करता है, उसी दिनसे उसके पीछे मृत्यु लग जाती है ।" १२४ : तीर्थकर महाबीर और उनकी आचार्य-परम्परा
SR No.090507
Book TitleTirthankar Mahavira aur Unki Acharya Parampara Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherShantisagar Chhani Granthamala
Publication Year
Total Pages654
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size14 MB
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