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________________ रखने और अपनी इच्छाओंके सीमित रखनेकी बात सोची हो । बाल्यावस्थामें ही उन्होंने अपनी प्रवृत्तियोंको परिष्कृत करने का प्रयास किया। महावीरका चिन्तन परिवारको परिधिसे आगे बढ़ने लगा । सामाजिक जीवन में उत्पन्न होनेवाली आर्थिक विषमता, वर्गभेद, दलित और पतितांक प्रति निष्करुण भावना आदिको दूर करने के लिये उन्होंने संकल्प किया। उनका जन्म ही आत्मकल्याण और लोकहितके लिये हआ था। अतएव लोककल्याण उनका इष्ट था और लोककल्याण हो उनका लक्ष्य था । किशोरावस्थाकी विचारधारा ___ महावीर सोचने लगे कि परम्परागत धर्म और धार्मिक कर्मकाण्ड मानवताके रूपको विकृत कर रहे हैं। वे मनुष्य-मनुष्य के बीच गहरी खाई उत्पन्न कर रहे हैं। वेद, कर्मकाण्ड और ब्राह्मणोंका स्वार्थमूलक व्यवहार समाजको विकृत करने में संलग्न है। जातिप्रथा कर्मकाण्डका मूल है और इस कर्मकाण्डपर पलके कारण तत्कालीन ब्राह्मण-समाज हिंसाप्रिय और अहमन्य है | आज जातिप्रथामें सडाँध आ गयी है । अतएव आजके समाजने मनुष्योंको विभिन्न वर्गोमें विभक्त कर दिया है । भाषा-नीति भी विकृत हो रही है। जनताको बोलीसे पृथक् संस्कृतमें पुरोहित या धर्माचार्य अपना प्रवचन करते हैं, जिससे शासक और शासित ये दो वर्ग अलग-अलग दिखलायी पड़ते हैं 1 जनताकी भाषामें बोल या लिखकर शासकवर्ग अपनी श्रेष्ठता सिद्ध नहीं कर सकता। अतएव सामान्य जनतासे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये ही शासकवर्ग मनमाना शोषण कर रहा है। उच्चवर्ग अपनी भाषा विशिष्ट बतलाकर जनतापर शासन कर रहा है। अतः जनताको धर्म और धर्म के ठेकेदारोंके शिकंजोंसे मुक्त करनेके लिये उन्हें भाषासे भी मुक्त करना होगा, जो निहित स्वार्थीको प्रतीक बन गयी है। ___ महत्त्व भाषाका नहीं, भावोंका है । वास्तवमें वही भाषा श्रेष्ठ है, जो वक्ता और श्रोताके बीच सेतु बन सके। जिस भाषाको जनता समझ सके उसीमें उपदेश देना या वैचारिक क्रान्ति करना युक्ति-संगत है। वर्तमानमें नारीकी भी प्रतिष्ठा समाप्त हो चुकी है। न उसे सामाजिक अधिकार प्राप्त हैं और न पारिवारिक । शिक्षा और धर्म-संस्कारोंको प्राप्त करनेके अधिकारसे भी वंचित है । वेदाध्ययन करना या धर्मानुष्ठान करना उसकी अधिकार-स्प्रेमासे बाहर है। अतएव नारीसमाजका उत्थान करना भी इस समय आवश्यक है। ११२ : तीमंकर महावीर और उनकी प्राचार्य-परम्परा
SR No.090507
Book TitleTirthankar Mahavira aur Unki Acharya Parampara Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherShantisagar Chhani Granthamala
Publication Year
Total Pages654
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size14 MB
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