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गावा : २५३६-२५३६ ] घउत्यो नहाहियारों
[ १७७ पुष्प-विसदिव्य एकोहकाण, पम्गि - सिदिव्य सस - कणाणं, विच्चाला विसु कमेण अरोच-विकास-बोमणा माल
:-पूर्व दिशामें स्थित एकोस्क पोर बाग्नेय दिशामे स्थित शासकर्ण कुमानुषों के अन्तराल आदिक अन्तरालोंमें क्रमशः आठ अन्तर-द्वीपों में स्थित कुमानुषों के नामोंको गिनना चाहिए
केसरि महामणुस्सा, चलि कम्पास चक्कुली - कण्णा । साण-महा कपि-पदण, पाकुलिकण्णा अपक्कली-कण्णा ॥२५३६।। ह्य • कण्णाई कमसो, कमाणसा तेस' होति दीवेस । धूल-मुहा काल-मुहा, हिमवंत-गिरिम्स पुष्व-पछिमरी ॥२५३७॥
प्रचं:-इन अन्तरद्वीपोंमें क्रमशः केशरीमुख, पाबुलीकणं, शकुलिकर्ण, श्वानमुख, कानरमुख, शकुलिकर्ण, शकुलिकर्ण और प्रश्वकर्ण कुमानुच होते हैं । हिमवान् पर्वतके पूर्व-पश्चिमभागोंमें कमश: कुमानुष घूक ( जल्ल ) मुस और कालमुख होते हैं ।।२५३६-२५३७।।
गो-मूह-मेष-मुहकक्षा, दक्षिण वेयड-पणिषि-बीवेत" ।
मेष-मुहा विश्व-महा, सिहरि-गिरिदस्त पुग्ध-पच्छिमदो ॥२५३८।।
सर्ग :-( वे कुमानुष ) दक्षिण-विजयात्र के प्रसिधिभागस्थ द्वीपों में गोमुख और येवमुख तपा शिखरी-पर्वतके पूर्व-पश्चिम द्वीपोंमें मेघमुख और विद्यान्मुख होते हैं ।।२५३८।।
बप्पण-गप-सरिस-नहा, उसमयड्व-पनिविभाग-पक्ष । प्रारभतरम्मि भागे पाहिए होंति सम्मेत्ता ॥२५३६॥
:-उत्तर-विजयार्षक प्रणिधिभागोंको प्राप्त हुए वे कुमानुष क्रमशः दर्पण पोर हापी सद्दश मुखवाले हैं। जितने (२४) कुमानुष अभ्यन्तर भागमें हैं, उतने ( २४ ) ही माझमागमें है ॥२५३६॥
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१. इ.स..प.प. उ. दोमु ।