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________________ तिलोय पण्णत्ती [ माया ९१-९२ युक्त भव्यजनोंको श्रानन्दके प्रसारका उत्पादक और जिनभगवान् के मुखरूपी कमलसे निर्गत यह् त्रिलोकप्रज्ञप्ति नामक ग्रन्थ कहता हूं || ६८- ९०१ लोकाकाशका लक्षण जगसेदि - घण- पमाणो लोयायासो स-पंच बच्व-ठिदी । एस प्रणंताणंता लोयायासस्स बहुम ॥१॥ ܘ܀ = १६ ख ख ख' श्रथं : – यह् लोकाकाश ( = ) अनन्तानन्त अलोकाकाश ( १६ ख ख ख ) के बहुमध्यभागमें जीवादि पाँच द्रव्योंसे व्याप्त और जगच्छ्र पीके घन ( ३४३ घन राजू ) प्रमाण है ।।९१ । विशेष :- इस गाथाकी दृष्टि (= १६ ख ख ख ) का अर्थ इसप्रकार है Et . का अर्थ लोककी प्रदेश - राशि एवं धर्माधर्म की प्रदेश राशि | १६, सम्पूर्ण जीव राशि | १६ ख, सम्पूर्ण पुद्गल ( की परमाणु ) राशि । १६ ख ख, सम्पूर्ण काल ( की समय ) राशि । १६ ख ख ख, सम्पूर्ण प्रकाश ( की प्रदेश ) राशि | जीवा पोग्गल - धम्माधम्मा काला इमाणि दध्वारिण । सय्यं 'लोयायासं श्रधूय पंच 'चिति ||१२|| अर्थ : – जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल, ये पाँचों द्रव्य सम्पूर्ण लोकाकाशको व्याप्तकर स्थित हैं ||१२ ॥ एत्तो से ढल्स घरणप्पमारणारण शिण्णयत्थं परिभासा उच्चदे अन यहाँसे श्रागे श्रेणिके धन प्रमाण लोकका निर्णय करने के लिए परिभाषाएँ अर्थात् पत्योपादिका स्वरूप कहते हैं १, द ख ख ख × २ । २. द. ब. क. ज. ठ. लोयायासो - ४. . . चरंति, क. चिरंति, ज. ठ. विरति । ३. द. क. भाउवडिदि श्राधूय ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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