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________________ गाथा: ८ १२ । हम महाहियारो | ३ अर्थ :- मङ्गल, कारण, हेतु, प्रमाण, नाम और कर्ता इन छह अधिकारोंका शास्त्र के पहले ही व्याख्यान करना चाहिए ऐसी प्राचार्य की परिभाषा ( पद्धति ) है ||७|| मङ्गलके पर्यायवाचक शब्द पुण्णं पूर्व - पवित्ता पसत्य-सिव-भद्द - खेम - कल्लारखा । सुह-सोक्खादी सव्वे रिपट्ठिा मंगलस्स पज्जाया ॥ ८ ॥ अर्थ :- पुण्य, पूत, पवित्र, प्रशस्त, शिव, भद्र, क्षेम, कल्याण, शुभ और सौख्य इत्यादिक सब शब्द मङ्गलके ही पर्यायवाची (समानार्थक ) कहे गये हैं || ८ || मङ्गल - शब्दकी निरुक्ति गायदि विरणासयदे घादेदि दहेदि हंति सोधयदे | विद्धसेदि मलाई जम्हा तम्हा य मंगलं भरिषदं ॥ ६ ॥ अर्थ :- क्योंकि यह मलको गलाता है, विनष्ट करता है, घातता है, दहन करता है, मारता है, शुद्ध करता है और विध्वंस करता है, इसीलिए मङ्गल कहा गया है || ९ || मङ्गलके भेद पूण | मलस्स इह दव्व-भाव-भेएहि । बाहिरमभंतरं चेय ॥ १० ॥ दोfor farप्पा होंति दव्यमलं दुविहप्प अर्थ :- ( यथार्थतः ) द्रव्य और भावके भेदसे मलके दो प्रकार हैं, पुनः द्रव्यमन्न दो तरहका है -- बाह्य और आभ्यन्तर || १० || द्रव्यमल और भावमलका वर्णन सेद' - जल- रेणु-कद्दम - पहूदी बाहिर-मलं समुद्दिट्ठ । धरण' दिव-जीव-पवेसे बिंध - रुवाइ पर्याड - ठिदि आई ।।११।। श्रणुभाग "-पदेसाई चह पत्तेक्क भेज्जभारणं तु । खारणावर रणप्पहूदी-टु-विहं कम्ममखिल- पावरयं ॥ १२ ॥ १. द. ज. क. ठ इमं । २. ज. 5. दुनियध्वं । ३. द. ज. क. ठ. सीदजल । ५. द. ज. क. ठ. अणुभावपदेसाई । ४. द. ज. क. ठ.
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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