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________________ विषय घनफल प्राप्त करने हेतु गुणकार एवं भागहार सप्त स्थानों के भागहार एवं मंदरमेरु लोक का घनफल दूष्य लोक का घनफल और उसकी आकृति गिरिकरक लोक का घनफल और उसकी आकृति अधोलोक का घनफल कहने की प्रतिज्ञा यवमुरज अधोलोक को आकृति एवं घनफल यवमध्य अधोलोक का घनफल गाथा / पृ० सं० २३०-३२ । ८२ २३३ । ८३ २३४-३५ । ८४ २३६ । ८६ २३७-३८ । ८७ एवं आकृति मंदरमेरु अधोलोक का घनफल और उसकी श्राकृति २३६ | ८६ २४० | ११ २४१-४१ । ६२ २५०-५१ । ६७ २५२ / ६६ दूष्य अधोलोक का चनफल frfoकटक अधोलोक का घनफल अधोलोक के वर्णन की समाप्ति एवं ऊर्ध्वलोक के वर्णन की सूचना २५३ । १०० सामान्य तथा ऊर्ध्वायत चतुरस्र ऊर्ध्वलोक के घनफल एवं आकृतियाँ तिर्थंगायत चतुरस्र तथा यवमुरज ऊर्ध्वलोक एवं श्राकृतियाँ २५५-५६ । १०२ यवमध्य ऊर्ध्वलोक या घनफल एवं आकृति २५७ । १०४ मन्दरमेस ऊर्ध्वलोक का घनफल २५४ । १०० २५८-६६ । १०६ ७३ विषय दृष्य क्षेत्र का घनफल एवं गिरिकटक क्षेत्र कहने की प्रतिज्ञा २६७-६८ । ११० गिरिकटक ऊर्ध्वलोक का घनफल २६९ | ११२ बाके प्रतिज्ञा की गाथा / पृ० सं० २७० ११२ लोक को परिवेष्टित करने वाली वायु का स्वरूप वातवलयों के बाहृत्य ( मोटाई) का प्रमाण एक राजू पर होने वाली हानि वृद्धि का प्रमाण पार्श्व भागों में वातवलयों का बाहुल्य वातमण्डल की मोटाई प्राप्त करने का विधान मेरुतुल से ऊपर वातवलयों की मोटाई का प्रमाण पार्श्वभागों में तथा लोकशिखर पर पवनों की मोटाई २७१-७२ । ११३ २७३-७६ | ११३ २७७-७८ । ११६ २७६ । ११६ २८० । ११७ २८१-८२ । ११८ २८३-८४ । ११६ वायुरुद्धक्षेत्र यादि के घनफलों के निरूपण को प्रतिज्ञा वातावरुद्ध क्षेत्र निकालने का विधान एवं घनफल लोक के शिखर पर वायुरुद्ध क्षेत्र का घनफल पवनों से रुद्ध समस्त क्षेत्र के घनफलों का योग २६५ । ११२ ११९ १२५ १२६
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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