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________________ ६७ प्रथम बिल से यदि वे बिल का विस्तार प्राप्त करना हो तो सूत्र यह है : a=-(०-१)d, यदि अंतिम बिल से तवं बिल का विस्तार प्राप्त करना हो तो सूत्र यह है : b.b+(D-.--१)d, जहां 2. प्रौदा कम वें बिलों ने विस्तारों के प्रतीक हैं । यहाँ विस्तार का अर्थ व्यास किया जा सकता है। __गाथा २१५७ : इन बिलों की गहराई (बाहल्य) समान्तर श्रेणी में है । कुल पृथ्वियां ७ हैं । यदि nथीं पृथ्वी के इन्द्रक का बाल्य निकालना हो तो सूत्र यह है॥वीं पृथ्वी के इन्द्रक का बाहल्य= (+१) ३ वाहन (७-१) 0वीं पृथ्वी के श्रेणिबद्ध बिलों का बाहल्य = (n+१) ४४ इसी प्रकार, n वी पृथ्वी के प्रकीर्णक बिलों का बाहल्य= । बाल्य (७-१) ? गाथा २१५८ : दूसरी विधि से बिलों का बाहल्य निकालने हेतु ग्रंथकार ने आदि के प्रमाण क्रमश: ६, ८ और १४ लिये हैं । यहाँ भी पृध्वियों की संख्या ७ है। यदि । वीं पृथ्वी के इन्द्रक का बाहल्य निकालना हो तो सूत्र निम्नलिखित है : .' 1 वीं पृथ्वी के इंद्रक का बाहल्य == (६+n.) यहां ६ को आदि लिखें तो दक्षिण पक्ष= (en) होता है। प्रकीर्णक बिलों के लिए भी यही नियम है। गाथ २१६६ : यहां घर्मा या रत्नप्रभा के नारकियों की संख्या निकालने के लिए जगश्रेणी और घनांगुल का उपयोग हुआ है । घनांगुल को ६ और सूच्यंगुल को २ लेकर धर्मा पृथ्वी के नारकियों की संख्या : ७१) ७ -१ =जगश्रेणी x (कुछ कम ) //६ = जगणे णो » [कुछ कम /(२)' ]
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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