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________________ गाथा १/१८१ इस गाथा में दो सूत्र दिये गये हैं। भुजा+प्रतिभुजा -व्यास; व्यास x ऊँचाई x मोटाई समकोण त्रिकोण क्षेत्र का घनफल व्यास x लम्ब बाहु x मोटाईलम्ब बाहुयुक्त क्षेत्र का धनफल गाथा १/२१६ आदि : सम्पूर्ण लोक को आठ प्रकार की आकृतियों में निदर्शित किया गया है। इसमें प्रयुक्त सूत्र निम्न प्रकार हैं । सभी आकृतियों के घनफल जगश्रेणी के घन प्रमाण हैं । (१) सामान्यलोक=जग रिण के घन प्रमाण यह प्राकृति पूर्व में ही दी जा चुकी है जो सामान्यत: मान्य रूप है। (२) ऊर्य प्रायत चतुरस्र : जगश्रेणी के धन प्रमाण यह आकृति घनाकार होना चाहिए जिसकी लंबाई, चौड़ाई एवं ऊंचाई समानरूप से जगश्रेणी या ७ राजू हों । इस प्रकार इसका घनफल = लंबाई x चौड़ाई xऊँचाई=७४७४७ घन राजू - ३४३ घन राजू (३) तिर्यक् प्रायत चतुरस्र : जगश्रेणी के घन प्रमाण इस आकृति में सभी विमाएं समान नहीं हैं, अतएव घनायत रूप इसका धनफल = १४४३४७ घन राजू - ३४७ धन राजू (४) यवमुरज क्षेत्र : यह क्षेत्र मुरज और यवों के द्वारा दर्शाया गया है । मुरज प्राकृति बीच में है राजू तथा अंत में १ राजू १ राजू है। अतएव उसका क्षेत्रफल (4)x १४ वर्ग राजू है, क्योंकि इसकी ऊंचाई १४ राजू है । यहां मुखभूमि योग दले वाला ही सूत्र लगाया गया है । अत: सुरज आकृति का क्षेत्रफल - (+१) १४ वर्ग राजू-६३ वर्ग राजू मुरज प्राकृति का घनफल क्षेत्रफल - गहराई–६३४७ धन राजू -४४१ घन राजू
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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