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________________ ३२४ ] तिलोयपाएत्ती [ गाथा : २०८-२११ अर्थ:- जो भूतिकर्म, मन्त्राभियोग और कौतुहलादिसे संयुक्त हैं, तथा लोगोंकी वंचना करने में प्रवृत्त रहते हैं, वे वाहन देवोंमें उत्पन्न होते हैं ।।२०७॥ किल्विषिक-देवोंमें उत्पत्ति के कारण तित्थयर-संघ-पडिमा-प्रागम-नांथादिएस पडिफूला। दुरिवणया णिगदिल्ला जायंते किरिबस-सुरेसु ॥२०॥ अर्थ:-तथंकर, संघ-प्रतिमा एवं आगम-ग्रन्थादिकके विषय में प्रतिकूल, दुविनयी तथा प्रलाप करनेवाले ( जीव ) किल्विषिक देवोंमें उत्पन्न होते हैं ।।२०८।। सम्मोह-देवोंमें उत्पत्तिके कारण उप्पह-उपएसयरा विप्पडिवण्णा जिरिंगद-मग्गम्मि । मोहेणं संमूढा सम्मोह-सुरेसु जायते ॥२०६।। अर्थ :-उत्पथ-कुमार्गका उपदंश करनेवाले, जिनेन्द्रोपदिष्ट मार्गके विरोधी और मोहसे - मुग्ध जीव सम्मोह जाति के देषोंमें उत्पन्न होते हैं ।।२०६।। असुरोंमें उत्पन्न होने के कारण जे कोह-माण-माया-लोहासत्ता किलिट्र-चारित्ता । वइराणबद्ध-रुचिणो ते उप्पज्जंति असुरेसु ॥२१०॥ पर्थ :- जो क्रोध, मान, माया और लोभमें आसक्त हैं; दुश्चारित्रबाले ( कूराचारी) हैं तथा बैर-भावमें रुचि रखते हैं । वे असुरोंमें उत्पन्न होते हैं ।।२१०॥ उत्पत्ति एवं पर्याप्ति वर्णन उप्पज्जते भवणे उववादपुरे महारिहे सयणे । पावंति छ- पत्ति जादा अंतो-मुहत्तेण ॥२१॥ प्रर्य :-( उक्त जीव ) भवनवासियोंके भवनके भीतर उपपादशालामें बहुमूल्य शय्यापर उत्पन्न होते हैं और अन्तर्मुहूर्तमें ही छह पर्याप्तियाँ प्राप्त कर लेते हैं ।।२११।।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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