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________________ ३१८ ] तिलोयपण्णत्ती .[ गाथा : १८०-१८३ अर्थ :-भवनवासी देवोंका अवधिज्ञान अपने-अपने भवनोंके नीचे-नीचे थोड़े-थोड़े क्षेत्रमें प्रवृत्ति करता है परन्तु वही तिरछेरूपसे बहुत अधिक क्षेत्रमें अबाधित प्रवृत्ति करता है ॥१७॥ क्षेत्र एवं कालापेक्षा जघन्य अवधिज्ञान पणवीस जोयणाणि होदि जहणपण प्रोहि-परिमाणं । भाषणवासि-सुराणं एषक-विणभंतरे काले ॥१०॥ यो २५ । का दि १ । प्रयं :-भवनबासी देवोंके अवधिज्ञानका प्रमाण जघन्यरूपसे पच्चीस योजन है । पुनः कालकी अपेक्षा एक दिनके भीतरको बस्तुको विषय करता है ।।१८०॥ ___ असुरकुमार-देवोंके अवधिज्ञानका प्रमाण असुराणामसंखेज्जा जोयण-कोडीउ प्रोहि-परिमाणं । खेत्ते कालम्मि पुणो होंति असंखेज्ज-वासाणि ॥११॥ रि। क । जो। रि । व। अर्थ :--असुरकुमार देवोंके अवधिज्ञानका प्रमाण क्षेत्रकी अपेक्षा असंख्यात करोड़ योजन और कालकी अपेक्षा असंख्यात वर्षमात्र है ॥१८१।। शेष देवोंके अवधिज्ञानका प्रमाण संखातीद-सहस्सा उक्कस्से जोयणाणि सेसारणं । असुराणं कालादो संखेज्ज-गुरणेण हीणा य ॥१२॥ अर्थ :-शेष देवोंके अवधिज्ञानका प्रमाण उत्कृष्ट रूपसे क्षेत्रकी अपेक्षा असंख्यात हजार योजन और कालकी अपेक्षा असुरकुमारोंके अवधिज्ञानके कालसे संख्यातगुणा कम है ।।१८२॥ अवविक्षेत्र-प्रमाण विक्रिया णिय-णिय-पोहोक्खेत्तं णाणा-रुवाणि तह 'विकुव्वंता । पूरंति असुर पहुवी भावण-देवा दस-वियप्पा ॥१३॥ !! अोही गदा ॥ १. द. क. वकुष्यंता, ज. ६. बकुवंतो ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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