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________________ गाथा : १७७-१७६ ] तदिश्रो महाहियारो [ ३१७ अर्थ :- असुरकुमारादिक दस निकायोंमें सर्वं निकृष्ट देवोंकी जधन्य श्रायुका प्रमाण दस हजार वर्ष है || १७६ ।। असुराण पंचवीस सेस सुराणं हवंति दस दंडा । एस सहा उच्छेहो विक्किरियंगेसु बहुमेया ॥ १७७॥ दं २५ । दं १० । ॥ उच्छेो गदो 11 प्रर्थ :-- प्रसुरकुमारोंकी पच्चीस धनुष और शेष देवोंकी ऊँचाई दस धनुष मात्र होती है. शरीर की यह ऊँचाई स्वाभाविक है किन्तु विक्रिया निर्मित शरीरोंकी ऊँचाई अनेक प्रकारकी होती है ।। १७७ ।। || आयुका प्रमाण समाप्त हुआ ।। भवनवासी देवोंके शरीरका उत्सेध हो धो । ॥ उत्सेधका कथन समाप्त हुआ || ऊर्ध्व दिशा में उत्कृष्ट रूपसे अवधिक्षेत्रका प्रमाण यि निय-भवण-ठिदाणं उक्कस्से भवणवासि देवाणं । उद्वेग होदि णाणं कंचरण गिरि - सिहर - परियंतं ॥ १७६ ॥ अर्थ :- अपने - अपने भवनमें स्थित भवनवासी देवोंका अवधिज्ञान ऊर्ध्वदिशामें उत्कृष्टरूप से मेरुपर्वत शिखरपर्यंन्त क्षेत्रको विषय करता है ।।१७८ ॥ घः एवं तिर्यग् क्षेत्र में अवधिज्ञानका प्रमाण तद्वाणादोधोधो थोवत्थोवं पयट्टदे श्रोही । तिरिय-सरूत्रेण पुरणो बहुत र बेत्तेसु प्रक्खलिवं ॥ १७६ ॥ १. व. रु. गदा | २ द तट्टारणादो दोहो, ब. तट्टारणादोद्दो, क. तट्ठारणादो दो धो, ज. ठ. तट्ठाणादो
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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