SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 393
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३१६ | तिलोयपत्ती देवी' धरणार्णवे श्रहियं वेणुम्मि हवेदि पुष्वकोडि-तियं । श्राउसंखा श्रदिरितं प । पुको ३ । [ गाथा : १९७२ - १७६ वेणुधारिस्स || १७२ ॥ अर्थ :- धरणानन्दकी देवियोंकी आयु पल्यके श्रायें भागसे श्रधिक, बेणुकी देवियों की तीन पर्वकोटि और गुधारीकी देवियोंकी ग्रायु तीन पूर्व कोटियोंसे अधिक है ॥ १७२ ॥ पले कमाउसंखा देवी तिष्णि वरिस- कोडोश्रो । सम्मि प्रविरित उत्तरदम्मि ॥१७३॥ दक्aिfणवे व को ३ । अर्थ :- अवशिष्ट दक्षिण इन्द्रों में से प्रत्येकको तीन करोड़ वर्ष और उत्तर इन्द्रोंमेंसे प्रत्येक की देवियोंकी श्रायु इससे अधिक है ।। १७३ ॥ 'पडिइंदाबि चउण्हं श्राऊ देवीण होदि पत्तेक्कं । णिय-जिय-इंद-पविण्णद- देवी श्राउस्स सारिच्छो ॥ १७४॥ अर्थ :- प्रतीन्द्रादिक चार देवोंकी देवियोंमेंसे प्रत्येकको अपने अपने इन्द्रोंकी देवियोंकी कही गई प्रायुके सहश होती है ।। १७४ ।। जेत्तियमेत्ता श्राऊ सरीररक्खादियाण देवीणं । तस्स पमाण-शिरूयम उवदेसो णत्थि काल - वसा ॥ १७५ ॥ अर्थ :- अंगरक्षक श्रादिक देवोंकी देवियोंकी जितनी श्रायु होती है, उसके प्रमाणके कथनका उपदेश कालके बशसे इस समय नहीं है ।। १७५ ।। भवनवासियों की जघन्य-आयु प्रसुराविद ब- दस - कुलेसु सव्य- णिगिट्ठा र बस वास - सहस्साणि जहण्ण श्राजस्त || आउ परिमाणं समत्तं ४ || होवि देवरणं । परिमाणं ॥ १७६ ॥ १. द. ब. क. ज. उ. अंदेवी । २. द. ब. क. ज. पािदि । ३. ब. क. ज. ठ. गिरिद्वारा । ४. द. ब. क. ज. ल. सम्मत्ता ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy