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________________ २२ ] तिलोय पण्णत्ती पउमा पउम सिरीश्री कणयसिरो करणयमाल-महपउमा । अग्ग- महिसीउ बिदिए विविकरिया पहुवि पुखं व' ॥६४॥ अर्थ :- द्वितीय (वैरोचन ) इन्द्र के पद्मा पद्मश्री, कनकश्री कनकमाला और महापद्मा, ये पाँच अग्र देवियाँ होती हैं, इनके विक्रिया श्रादिका प्रमाण पूर्व ( प्रथम इन्द्र) के सदृश ही जानना चाहिए ।। ६४ ।। पण अग्ग - महिसियाओ पत्तं क्कं बल्लहा दस सहस्ता । णागिदाणं होंति हु विविकरियप्पहृदि पुरुषं व ॥६५॥ [ गाथा : ६४-६७ ५ | १०००० ४०००० | ५०००० । अर्थ :- नागेन्द्र ( भूतानन्द और धरणानन्द ) मेंसे प्रत्येककी पांच अग्र देवियाँ श्रोर दस हजार वल्लभाएँ होती हैं। शेष विक्रिया आदिका प्रमाण पूर्ववत् ही है ||२५|| चत्तारि सहस्सा रिंग यल्लहियात्री हवंति गरुडदाणं सेसं पुन्वं पिव एत्थ ५४००० | ४०००० | ४४००० पत्त वकं । वक्तव्यं ॥६६॥ अर्थ :--गरुडेन्द्रोंमेंसे प्रत्येककी चार हजार वल्लभायें होती हैं । यहाँ पर शेष कथन पूर्वके सदृश ही समझना चाहिए ||३६|| सेसारणं इंदारणं पतक्कं पंच प्रग्ण महिसीओो । एदेसु छस्सहस्सा स-समं परिवार देवी ॥ ६७ ॥ १. द. वा । क्र. ज. ठ. च । २. द. वाक. च ५ । ६००० | ३०००० । अर्थ :-- शेष इन्द्रोंमेंसे प्रत्येकके पांच अग्र देवियां और उनमेंसे प्रत्येकके अपने (मूल शरीर ) को सम्मिलित कर छह हजार परिवार देवियाँ होती हैं ।। ६७ ॥ ३. द. व. गरुरंगदारण। ज. द. गाणं
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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