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________________ २७४ ] तिलोयपती गाथा : ३०-३२ अर्थ :- गोपुरद्वारोंसे युक्त और उपरिम भाग में जिनमन्दिरोंसे सहित वे वेदियाँ भवनवासी देवोंसे रक्षित होती हुई सुशोभित होती हैं ||२९|| दियो बाह्य स्थित चनोंका निर्देश तब्बाहिरे सोयं सत्तच्छद - चंपयाय चूदवरणा । पुत्रादिसु णाणातरु-चेत्ता चिट्ठति चेत्त-तरू सहिया ||३०|| अर्थ : – वेदियोंके बाह्यभागमें चैत्यवृक्षोंसे सहित और अपने नाना वृक्षोंसे युक्त, (क्रमश:) पूर्वादि दिशाओं में पवित्र अशोक, सप्तच्छद, चम्पक और आम्रवन स्थित हैं ||३०|| चैत्यवृक्षों का वर्णन चेत्तद्द म-थल-रुदं दोणि सया जोयणाणि पण्णासा । चत्तारो मज्झम्मि य अंते को सद्धमुच्छेहो ॥३१॥ * २५० १ अर्थ :- चैत्यवृक्षोंके स्थलका विस्तार दोसो पचास योजन तथा ऊँचाई मध्य में चार योजन और अन्तमें अर्धकोस प्रमाण है ||३१|| छद्दो- सू-मुह-रुंदा चउ-जोयण- उच्छिवाणि पीठाणि । पीठोवरि बहुमज्भे रम्मा चेति चेत-दुमा ॥३२॥ जो ६ । २ । ४ । १. उपरोक्त चित्र प्रक्षेप रूप है एवं उसमें दिया हुआ प्रमाण स्केल रूप नहीं है । २. द. ब. क. ज. ठ. रुंदो ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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