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________________ अब पूर्ण हुआ ऐसा माना जा सकता है । पूर्वमुद्रित संस्करण में गाथा ३४५ का हिन्दी अनुवाद करते हुए अनुवादक महोदय ने लिखा है कि-"रत्नप्रभा पृथिवी से लेकर प्रन्तिम पृथिवी पर्यन्त अत्यन्त सड़ा, अशुभ और उत्तरोत्तर प्रसंख्यातगुणा ग्लानिकर अन्न आहार होता है।" यह अर्थ ग्राह्य नहीं हो सकता क्योंकि नरकों में अन्नाहार है ही नहीं। प्रस्तुत संस्करण में टीकाक: माताजी ने इसका अर्थ 'अन्य प्रकार का ही आहार' (गाथा ३४८) किया है । यह संगत भी है । पूज्य माताजी ने ७ सारणियों और दो चित्रों के माध्यम से इस अधिकार को और सुबोध बनाया है। ग्रन्थकर्ता आचार्य ने पूरी योजनापूर्वक इस अधिकार का गठन किया है। गाथा ६-में असनाली का निर्देश है । गाथा ७-८ में प्रकारान्तर से उपपाद और मारणान्तिक समुद्घात में परिणत अस और लोकपूरण समुद्घातगत केवलियों की प्रपेक्षा समस्तलोक को ही त्रसनाली कहा है। गाथा १ से १६५ तक नारकियों के निवास क्षेत्र सातों पृथिवियों में स्थित इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिलों के नाम, विन्यास, संख्या, विस्तार, बाहल्य एवं स्वस्थान-परस्थान रूप अन्तराल का प्रमाण निरूपित है । गाथा १९६-२०२ में नारकियों की संख्या, २०३-२१६ में उनकी श्रायु, २१७-२७१ में उनका उत्सेध तथा गाथा २७२ में उनके अवधिशान का प्रमारप कहा है। गाथा २७३-२८४ में नारकी जीवों में सम्भव गुणस्थानादि बीस प्ररूपरणाओं का निर्देश है 1 गाथा २८५-२८७ में नरकों में उत्पद्यमान जीवों की व्यवस्था, गाथा २८८ में जन्म-मरण के अन्तराल का प्रमाण, गाया २८९ में एक समय में जन्म-मरण करने बालों का प्रमाण, माथा २१०-२६३ में नरक से निकले हुए जीवों की उत्पत्ति का कथन, गाया २६४-३०२ में नरकायु के बन्धक परिणामों का कथन और गा०३०३ से ३१३ तक नारकियों की जन्मभूमियों का वर्णन है। गाथा ३१४ से ३६१ तक नरकों के घोर दुःखों का वर्णन है। गाथा ३६२-६४ में नरकों में सम्यक्त्वग्रहण के कारणों का निर्देश है और गाथा ३६५ में नारकियों की योनियों का कथन है। अन्तिम मंगलाचरण से पूर्व के पांच छन्दों में यह बताया गया है कि जो जीव मद्य-मांस का सेवन करते हैं, शिकार करते हैं, असत्य वचन बोलते हैं, चोरी करते हैं, परधनहरण करते हैं, रात दिन विषय सेवन करते हैं, निर्लज्जतापूर्वक परदारासक्त होते हैं, दूसरों को ठगते हैं बे तीन दुःख को उत्पन्न करने वाले नरकों में जाकर महान् कष्ट सहते हैं। अंतिम गाथा में भगवान सम्भवनाथ को नमस्कार किया गया है। (ग) तृतीय महाधिकार : ___ भवनवासी लोकस्वरूप निरूपण प्रजप्ति नामक तीसरे महाधिकार में पूर्व प्रकाशित संस्करण में कुल २४३ पद्य हैं । गाथा संख्या २४ से २७ नक गाथाओं का पाठ इस प्रकार है
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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