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________________ [ २४५ गाथा : २८६-२६० ] विदुनो महायिारो नरकोंमें एक समयमें जन्म-मरण करने वालोंका प्रमाण रयणादि-णारयाणं णिय-संखादो असंखभागमिदा । पडि-समयं जायते 'तत्तिय-मत्ता य मरंति पुढे ॥२८॥ २उप्पज्जण-मरणाण परिमाण-वष्णणा समत्ता ।।६।। अर्थ :--रत्नप्रभादिक पृथिवियोंमें स्थित नारकियोंके अपनी संख्याके असंखनातवें भागप्रमाण नारकी प्रत्येक समयमें उत्पन्न होते हैं और उतने ही मरते हैं ।।२८६।। विशेषार्थ :-प्रत्येक नरकोंके नारकियोंकी संख्याका प्रमाग गा० १९६-२०२ पर्यन्त दर्शाया गया है । जिनकी संदृष्टियाँ २, २०], [.." इसप्रकार दी गई हैं। इनमें प्राड़ी लाइन () जगच्छणीकी, खड़ी पाई (1) वर्गमूलको और १२, १०, ८ आदि संख्या वर्गमूलके प्रमाणको द्योतक है। गा० २८६ की संधि (रि । "रि इत्यादि ) उन्हीं उपयुक्त संख्याओंमें असंख्यात ( जिसका चिह्न रि है ) का भाग देने हेतु परि इसप्रकार रखी गई हैं। इसप्रकार एक समयमें जन्म-मरण करने वाले जीवोंका कथन समाप्त हुआ ।।६।। नरकसे निकले हुए जीवोंकी उत्पत्तिका कथन णिकता णिरयादो गब्भ-भवे कम्म-संरिण-पज्जते । गर-तिरिएसुजम्मवि तिरिय चिय चरम-पुढवीदो ॥२६०।। अर्थ :-नरकसे निकले हुए जीव गर्भज, कर्मभूमिज, संज्ञी एवं पर्याप्तक मनुष्यों और तिर्यञ्चों में ही जन्म लेते हैं परन्तु सातवीं पृथिवीसे निकला हुआ जीव तिर्यञ्च ही होता है ( मनुष्य नहीं होता) ॥२९॥ २. द. ब. ज. क. ठ, उपज्ज। ३. द. तिरियेचिय, क.अ. . १.व.क. ज..तेत्तियमेत्ताए। तिरियच्चिय।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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