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________________ २३४ ] . तिलोयपणती [ गाथा : २५९.२६२ अट्ठावण्णा दंडा. सत्त-हिदा अंगुला य चउनीसं । खाडिदयम्मि तुरिमक्खोणीए णारयाण उच्छहो ॥२५॥ ध्र ५८, अं२४ । अर्थ :- चौथी पृथिवीके खाड इन्द्रकमें नारकियोंके शरीरका उत्सेध अट्ठावन धनुष और सातसे भाजित चौबीस ( ३३ ) अंगुल प्रमाण है ।।२५६।। वासट्ठी कोदंडा हत्थाई दोणि सुरिम-पुढवीए । चरिमिदयम्मि खडखड-णामाए णारयाण उच्छेहो ॥२६०॥ अर्थ :-चौथी पृथिवीके खड़खड़ नामक अन्तिम इन्द्रकमें नारकियोंके शरीरका उत्सेध बासठ धनुष और दो हाथ प्रमारण है ।।२६०।। पाँचवीं पृथिवीके उत्सेधको हानि-वृद्धिका प्रमाण बारस सरासणाणि दो हत्या पंचमीए पुढवीए । खय-बड्डीय पमाणं णिद्दिद्द वीयराएहि ॥२६॥ दं १२, ह २ । प्रयं :-वीतरागदेवने पाँचवीं पृथिवी में क्षय एवं वृद्धिका प्रमाण बारह धनुष और दो हाथ कहा है ।।२६१॥ पांचवीं पृथिवीमें पटलक्रमसे नारकियोंके शरीरका उत्सेध पणहत्तरि-परिमाणा कोदंडा पंचमीए पुढवीए । पढमिदम्मि उदो तम-पामे संठिदाण जीवाणं ॥२६२॥ अर्थ:-पाँचवीं पृथिवीके तम नामक प्रथम इन्द्रक बिलमें स्थित जीवोंके शरीरकी ऊंचाई पचहत्तर धनुष प्रमाण है ॥२६२३.
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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