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________________ गाथा २५५-२५८ ] विदु महाहियारो चालीसं कोदंडा वीसन्भहिथं सयं च पव्वाणि । सत्त-हिवा उच्छेहो 'तुरिमाए मार पडल- जीवाणं ।। २५५ ॥ ४०, १२० । पोथी धनुष और सातसे भाजित एकसी बीस ( १७ ) अंगुल प्रमाण है ।। २५५ ।। में रहने वाले जीवोंके शरीरकी ऊँचाई चालीस चउदाल चावाणि दो हत्था अंगुलाणि छष्ण उदी । सत्त-हिदा उच्छेहो तारिदय-संठिदाण जीवाणं ॥ २५६ ॥ ४४२ अं [ २३३ प्रथं : चौथी पृथिवीके तार इन्द्रक में स्थित जीवोंके शरीरका उत्सेध चवालीस धनुष, दो हाथ और सातसे भाजित छ्यानबे ( १३ ) अंगुल प्रमाण है ।। २५६ ।। एक्कोण पण बंडा महत्तरि अंगुला यसप्त-हिदा चिदस्मि' तुरिमक्लोणीए णारयाण उच्छेहो ।। २५७ ।। ध ४६, ७२ । अर्थ :- चौथी पृथिवीमें तत्व (चर्चा) इन्द्रकमें नारकियोंके शरीरका उत्सेध उनचास धनुष और सातसे भाजित बहत्तर ( १० ) अंगुल प्रमाण है ।। २५७ ।। " तेवण्णा चावाणि बिय हत्था श्रट्टताल पव्वाणि । सत्त-हिदाणि उदश्रो तमगिदय- संठियाण जीवाणं ।। २५८ ।। ५३,२, ४८ । :-तमक इन्द्रकमें स्थित जीवोंके शरीरका उत्सेध तिरेपन धनुष, दो भाजित अड़तालीस ( ६ ) अंगुल प्रमाण है ।१२५८ || १. व. ब क उ पंचाए । २. व. ब. क. ठ. तसिदयस्मि । ३. ब. तेपणाव । हाथ और सात से
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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