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________________ २१० ] तिलोय पण्णत्ती [ गाथा : १८९-१९१ धर्मादिक छह पृथिवियोंमें प्रकीर्णक- बिलोंके स्वस्थान एवं परस्थान अन्तरालोंका प्रमाण छक्कदि हिदेवकणउदी - कोसोणा छस्सहस्स-पंच-सया । जोयणया धम्माए पइण्णयाणं हवेदि विच्चालं ॥ १६६ ॥ ६४६६ । को १ । १ । श्रयं :- घर्मा पृथिवीमें प्रकीर्णक बिलोंका अन्तराल, इक्यानबे में छहके वर्गका भाग देने पर जो लब्ध प्रावे, उतने कोस कम छह हजार पाँचसी योजन प्रमाण है ॥ १८९॥ विशेषार्थ : - योजन ६५०० पृथिवीकी मोटाई ५०००० -- - २००० = ७६००० यो० ३२) × ६३ = ६४६६६४ योजन या ६४६६ योजन १३ अन्तराल है । x १ ) = ६४९९ यो० १३ कोस, अथवा धर्मा : (७८००० - १३) + ' (००००. कोस पहली पृथिवीमें प्रकीर्णक बिलोंका वरणजदी - जुद-व-सय-दु-सहस्सा जोयस्पाणि बसाए । तिथि सारिंग दंडा उड्ढे पइण्णयाण विच्चालं ॥ १६०॥ २६६६ | दंड ३०० । अर्थ :- वंशा पृथिवी में प्रकीर्णक बिलोंका ऊर्ध्वग अन्तराल दो हजार नौ सौ निन्यानबे योजन और तीनसी धनुष प्रमाण है ।। १९० ॥ - २००० = 30000. विशेषार्थ :- ३२००० (xx २४) (११ - १ ) – (300 *) × १० = २६६६६४] योजन या २६६६ यो० ३०० दण्ड वंशा पृथिवीमें प्रकीर्शक विलोंका श्रन्तराल है । - प्रवृत्तालं दुसयं ति सहस्स- जोयरणारिप' मेघाए । वरण-सारिण धणू उठेण पइण्णयारण विच्चालं ॥। १६१ ॥ ३२४८ | दंड ५५०० । अर्थ :- मेघा पृथिवीमें प्रकीकि बिलोंका ऊर्ध्वग अन्तराल तीन हजार दो सौ अड़तालीस योजन र पाँच हजार पाँचसौं धनुष हैं ।।१६१॥ १. द. जोया ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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