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________________ २०६ ] तिलोयपण्णत्ती [ गाथा : १८१-१८३ . विशेषार्थ :--(८०००० – २००० -- ५३) (351)= (७८००० – १३)xs= २३१६-८६४६६ योजन अथवा ६४६६ योजन २१ कोस पहली पृथिवीमें श्रेणीबद्ध बिलोंका अन्तराल है। दूसरे नरकमें श्रेणीबद्धोंका अन्तराल गवरणउदि रणव-सयाणि बु-सहस्सा जोयणाणि वंसाए। ति-सहस्स-छ-सय-दंडा 'उड्डेणं सेटिबद्ध-विच्चालं ॥१८१॥ जो २६६६ । दंड ३६०० । पर्य :-वंशा पृथिवीमें श्रेणीबद्ध बिलोंका अन्तराल दो हजार नौ सौ निन्यानबै योजन और तीन हजार छह सौ धनुष प्रमाण है ॥१५१॥ विशेषार्थ :---( ३२००० - २०००)-(3xxi): 17-12 (102 -- १) =२६६९ योजन अथवा २९९९ योजन ३६०० दण्ड अन्तराल है। तीसरे नरकमें श्रेणीबद्धोंका अन्तराल उरणवण्णा दु-सयाणि ति-सहस्सा जोयणाणि मेघाए । दोणि सहस्साणि धणू सेढीबद्धाण विच्चालं ॥१२॥ जो ३२४६ । दंड २००० । अर्थ :-मेघा पृथिवी में श्रेणीबद्ध बिलोंका अन्तराल तीन हजार दो सौ उनचास योजन और दो हजार धनुष है ॥१८२।। विशेषार्थ :-(२८००० – २०००)-(ixix):= ( २५ -1)xt =३२४६१ योजन अथवा ३२४६ योजन २००० दण्ड मेघा पृथिवीमें श्रेणीबद्ध बिलोंका अन्तराल है। चतुर्थ नरकमें थेणीबद्धोंका अन्तराल रणव-हिद-बावीस-सहस्स-वंड-हीरणा हवेदि छासट्री। जोयण-छत्तीस'-सयं तुरिमाए सेढीबद्ध-विच्चालं ॥१३॥ जो ३६६५ । दंड ५५५५ । ५ । १. द. योउढोणं, ब. क उढीणं । २. द. हुवेदि। ३. ब. बत्तीससयं ।
SR No.090504
Book TitleTiloypannatti Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorChetanprakash Patni
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages434
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size8 MB
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